Indian Pharma: $500 बिलियन का बड़ा मौका! पेटेंट खत्म होने से भारत की फार्मा कंपनियों की चमकेगी किस्मत

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Indian Pharma: $500 बिलियन का बड़ा मौका! पेटेंट खत्म होने से भारत की फार्मा कंपनियों की चमकेगी किस्मत

ग्लोबल मार्केट में करीब **$500 बिलियन** की दवाओं के पेटेंट **2033** तक खत्म होने जा रहे हैं, जो भारतीय फार्मा सेक्टर के लिए एक बड़ा गेम-चेंजर साबित हो सकता है। इस बदलाव का फायदा उठाने के लिए कंपनियां सरकार की **₹10,000 करोड़** वाली 'Biopharma SHAKTI' स्कीम का सहारा ले रही हैं, जो अब सिंपल जेनेरिक्स से आगे बढ़कर कॉम्प्लेक्स बायोलॉजिक्स पर फोकस कर रही हैं।

दुनिया भर के फार्मा सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। साल 2033 तक लगभग $500 बिलियन सालाना सेल वाली दवाएं 'पेटेंट क्लिफ' (patent cliff) की चपेट में आ जाएंगी। अब तक भारतीय कंपनियां सस्ते जेनेरिक्स के दम पर मार्केट में बनी हुई थीं, लेकिन अब वक्त आ गया है कॉम्प्लेक्स बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स की ओर रुख करने का, जो लिविंग सिस्टम से तैयार किए जाते हैं।\n\n### सरकार का बड़ा सपोर्ट\n\nइस बड़े बदलाव के बीच भारतीय कंपनियों को मदद देने के लिए सरकार ने 2026 की शुरुआत में 'Biopharma SHAKTI' पहल शुरू की है। ₹10,000 करोड़ का फंड सीधे तौर पर देश में बायोलॉजिक्स मैन्युफैक्चरिंग और क्लीनिकल रिसर्च का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए दिया जा रहा है। बायोलॉजिक्स का काम पारंपरिक जेनेरिक्स से बिल्कुल अलग है—इसमें लो-कॉस्ट के बजाय हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग और कड़े रेगुलेटरी नियमों की जरूरत होती है।\n\n### दिग्गज कंपनियों की नई चाल\n\nसेक्टर की प्रमुख कंपनियां अलग-अलग रास्ते चुन रही हैं। Biocon ने जेनेरिक्स और बायोसिमिलर्स को एक साथ इंटीग्रेट कर लिया है, ताकि प्रोडक्शन चेन पर पूरा कंट्रोल रहे। वहीं, Dr. Reddy’s Laboratories और Lupin जैसी कंपनियां स्पेशियलिटी पोर्टफोलियो पर दांव लगा रही हैं और ग्लोबल पार्टनरशिप्स कर रही हैं। यह रणनीति उन्हें अमेरिका जैसे देशों में अस्पताल और इंश्योरेंस सिस्टम को समझने में मदद करेगी।\n\n### रिस्क और चुनौतियां\n\nहालांकि अवसर बड़ा है, लेकिन निवेशकों को रिस्क भी ध्यान में रखना चाहिए। बायोलॉजिक्स का बिजनेस जेनेरिक्स के मुकाबले ज्यादा खर्चीला है और इसमें रिटर्न की गारंटी कम होती है। साथ ही, USFDA और EMA जैसे ग्लोबल रेगुलेटर्स के कड़े मानकों को पार करना और भी चुनौतीपूर्ण है। जैसे-जैसे कंपनियां एक ही हाई-वैल्यू सेगमेंट की ओर बढ़ेंगी, मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। निवेशकों के लिए अब यह देखना जरूरी होगा कि कंपनियां अपना पैसा R&D में कितनी समझदारी से खर्च कर रही हैं और किसे मंजूरी मिलने में सबसे कम वक्त लग रहा है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.