US जेनेरिक ड्रग टैरिफ प्लान के बीच भारतीय फार्मा स्टॉक्स स्थिर

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AuthorAditya Rao|Published at:
US जेनेरिक ड्रग टैरिफ प्लान के बीच भारतीय फार्मा स्टॉक्स स्थिर

अमेरिका द्वारा जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ लगाने की योजना के बावजूद, भारतीय फार्मा कंपनियों के शेयर स्थिर बने हुए हैं। इसका मुख्य कारण इस योजना के लागू होने में **2 साल** का लंबा समय है, जिससे कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन को एडजस्ट करने का मौका मिल रहा है। भारतीय कंपनियां अमेरिका के **40%** जेनेरिक सप्लाई का हिस्सा हैं, इसलिए निवेशक इस बात का आकलन कर रहे हैं कि कौन सी कंपनी इस प्रभाव को झेल पाएगी।

Detailed Coverage

अमेरिकी टैरिफ प्लान का फार्मा सेक्टर पर असर

अमेरिका सरकार द्वारा जेनेरिक दवाओं के इम्पोर्ट पर टैरिफ लगाने के प्रस्ताव से भारतीय फार्मा सेक्टर में थोड़ी अनिश्चितता का माहौल है। हालांकि, शेयर बाजार में घबराहट के बजाय समझदारी भरा रुख देखने को मिल रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस टैरिफ को लागू होने में 2 साल का समय है, जो कंपनियों को अपनी मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन को ठीक करने का पर्याप्त अवसर देगा।

अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग का महंगा सौदा

निवेशक इस बात पर गौर कर रहे हैं कि अमेरिका में प्रोडक्शन शुरू करना कितना महंगा पड़ सकता है। इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, भारत से अमेरिका में बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शिफ्ट करने पर लागत 20% से 50% तक बढ़ सकती है। जेनेरिक दवाओं के बाज़ार में जहां कीमत बहुत मायने रखती है, ऐसे में इन बढ़ी हुई लागतों को ग्राहकों तक पहुंचाना मुश्किल होगा। यही वजह है कि कंपनियां रातों-रात अपने भारतीय मैन्युफैक्चरिंग हब को बंद नहीं करेंगी, क्योंकि इससे कई ज़रूरी और कम मुनाफे वाली दवाएं बाज़ार से बाहर हो सकती हैं।

मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर एक बड़ी ताकत

भारतीय फार्मा कंपनियों ने सालों से अमेरिकी बाज़ार में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। Sun Pharma, Dr. Reddy’s Laboratories, Aurobindo Pharma, Lupin, Cipla, Zydus Lifesciences और Granules India जैसी बड़ी कंपनियां पहले से ही अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग या रिसर्च फैसिलिटी चला रही हैं। इन ऑपरेशन्स में इंडस्ट्री ने करीब $20 बिलियन का निवेश किया है। यह मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को एक बड़ी ताकत देता है, जिससे वे शुरुआत से सब कुछ बनाने के बजाय चुनिंदा और ज़रूरी प्रोडक्ट्स के लिए लोकल प्रोडक्शन बढ़ा सकती हैं।

रेवेन्यू पर असर और प्रोडक्ट की जटिलता

टैरिफ का असर हर कंपनी पर अलग-अलग होगा। निवेशक अब उन कंपनियों पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं जो सामान्य, कम मार्जिन वाले जेनेरिक दवाएं एक्सपोर्ट करती हैं, बजाय उन कंपनियों के जिनके पास खास और कॉम्प्लेक्स दवाएं हैं। जिन कंपनियों के पास ज़्यादा कैंसर की दवाएं, बायोसिमिलर या एडवांस्ड डिलीवरी सिस्टम वाली दवाएं हैं, वे शायद टैरिफ के दबाव से बेहतर तरीके से बच सकेंगी। इसके विपरीत, जिन कंपनियों का अमेरिकी बाज़ार से ज़्यादा रेवेन्यू आता है लेकिन वहां प्रोडक्शन क्षमता कम है, उन्हें मुनाफ़ा बनाए रखने में ज़्यादा चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

पॉलिसी पर नज़र

हालांकि सेक्टर अब ज़्यादा मुनाफे वाली इनोवेटिव थेरेपी और R&D में निवेश की ओर बढ़ रहा है, लेकिन निवेशकों को फिलहाल अमेरिकी ट्रेड पॉलिसी के स्पेसिफिक डिटेल्स पर नज़र रखनी होगी। यह देखना अहम होगा कि क्या ज़रूरी दवाओं को छूट मिलेगी, आंशिक रूप से अमेरिका में बनी दवाओं को कैसे ट्रीट किया जाएगा, और टैरिफ का अंतिम दायरा क्या होगा। निवेशक भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड नेगोशिएशन और अमेरिकी सरकार से आने वाले किसी भी नए ऐलान पर नज़र रखेंगे जो लागत पर अंतिम प्रभाव को स्पष्ट कर सके।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.