नकली दवाओं की बढ़ती शिकायतों के बीच भारत सरकार फार्मा सेक्टर के नियमों को सख्त कर रही है। नए बदलावों के तहत कंपनियों को डीबार करने का प्रावधान जोड़ा गया है, जिससे प्रमुख कंपनियों की ऑपरेशनल चुनौतियां बढ़ गई हैं।
भारत का फार्मा सेक्टर इस समय सरकारी जांच और सख्त नियमों के दौर से गुजर रहा है। सरकार ने 'ड्रग्स रूल्स, 1945' में संशोधन किया है, जिसके बाद अब अधिकारियों को उन फार्मा कंपनियों को डीबार (Debar) करने का अधिकार मिल गया है जो रेगुलेटरी अप्रूवल के लिए गलत डेटा जमा करती हैं। इस कदम का मकसद दवाओं की सप्लाई चेन को सुरक्षित बनाना और मरीजों का भरोसा बहाल करना है।
ग्राउंड लेवल पर सख्ती
गुजरात के फूड एंड ड्रग कंट्रोल एडमिनिस्ट्रेशन (FDCA) ने अब तक 50 फार्मा कंपनियों के लाइसेंस रद्द कर दिए हैं। यह कार्रवाई नकली और अवैध दवाओं के वितरण के मामलों के बाद की गई है। इन्वेस्टर्स के लिए यह एक संकेत है कि नियमों का पालन न करने पर लाइसेंस गंवाने और भारी कानूनी जुर्माने का जोखिम बढ़ गया है।
ब्रांड इमेज के लिए बड़ा खतरा
Sun Pharma, Cipla और Indian Immunologicals जैसी नामी कंपनियां भी हाल ही में सरकारी रडार पर आई हैं। हालांकि, इन कंपनियों का कहना है कि ये नमूने उनकी फैक्ट्रियों में नहीं, बल्कि नकली हैं, लेकिन इस तरह की घटनाएं ब्रांड वैल्यू को नुकसान पहुंचा सकती हैं। कंपनियों को अब ट्रैकिंग और पैकेजिंग तकनीक पर पहले से ज्यादा निवेश करना पड़ रहा है।
भविष्य की तैयारी: Drugs, Medical Devices and Cosmetics Bill, 2026
सरकार जल्द ही 'Drugs, Medical Devices and Cosmetics Bill, 2026' लाने की तैयारी कर रही है, जो पुराने 1940 के कानून की जगह लेगा। इसमें बेल (bail) के कड़े प्रावधान और कड़ी निगरानी की व्यवस्था होगी। हालांकि इससे कंपनियों की कॉस्ट बढ़ सकती है, लेकिन यह लंबे समय में सेक्टर को व्यवस्थित करने के लिए जरूरी माना जा रहा है। अब नजर इस बात पर है कि कंपनियां अपने प्रॉफिट मार्जिन को इन खर्चों के बीच कैसे मैनेज करती हैं।
