भारतीय फार्मा सेक्टर ने लगातार चौथी तिमाही में डबल-डिजिट ग्रोथ दर्ज की है। सितंबर 2026 तिमाही में कुल सेल्स **₹70,180 करोड़** के पार पहुंच गई है, जिसका मुख्य कारण क्रोनिक थेरेपी की बढ़ती डिमांड और बड़े प्लेयर्स का दबदबा है।
भारतीय दवा उद्योग फिलहाल एक शानदार दौर से गुजर रहा है। सितंबर 2026 की तिमाही में इंडस्ट्री की कुल सेल्स ₹70,180 करोड़ रही, जो पिछले साल के मुकाबले 12% ज्यादा है। गौर करने वाली बात यह है कि साल 2025 में यह ग्रोथ महज 6% से 8% के आसपास थी, लेकिन अब लगातार चार तिमाहियों से सेक्टर 10% से ऊपर की बढ़त बनाए हुए है।
इस ग्रोथ के पीछे की असली वजह
इस तेजी का मुख्य ड्राइवर 'क्रोनिक थेरेपी' है। कार्डियक (दिल की बीमारी), डायबिटीज और ऑन्कोलॉजी (कैंसर) जैसी बीमारियों के इलाज में दवाओं की मांग जबरदस्त है। दूसरी तरफ, CDSCO द्वारा लागू किए गए सख्त नियमों, जैसे कि 'रिवाइज्ड शेड्यूल M' और 'Good Manufacturing Practices (GMP)' ने खेल बदल दिया है। नियमों का पालन न कर पाने वाले छोटे मैन्युफैक्चरर्स के मार्केट से बाहर होने से, अब मार्केट का सारा कंट्रोल बड़ी और व्यवस्थित कंपनियों के हाथ में आ गया है।
टॉप कंपनियों का दबदबा
बड़ी फार्मा कंपनियां इस बदलाव का भरपूर फायदा उठा रही हैं। Sun Pharma की इंडिया फॉर्मुलेशन सेल्स 17.3% बढ़कर ₹5,552 करोड़ हो गई है। वहीं, Mankind Pharma ने भी 17.33% की दमदार ग्रोथ के साथ ₹4,337.86 करोड़ की नेट सेल्स दर्ज की है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
हालांकि सेक्टर में ग्रोथ अच्छी है, लेकिन यह हर जगह एक जैसी नहीं है। जहाँ डायबिटीज और कार्डियक सेगमेंट 20% से ज्यादा तेजी दिखा रहे हैं, वहीं एंटी-इंफेक्टिव दवाएं अभी भी सुस्त पड़ी हैं। इसके अलावा, बड़ी कंपनियां जो आक्रामक अधिग्रहण (acquisitions) कर रही हैं, उन पर कर्ज का दबाव और कंपनियों को सही तरह से मर्ज करना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कंपनियाँ लगातार बढ़ती कीमतों के दबाव और सप्लाई चेन की समस्याओं के बावजूद इस रफ्तार को बरकरार रख पाती हैं।
