भारतीय फार्मा कंपनियां अब जेनेरिक दवाओं से हटकर नई ड्रग डिस्कवरी (Drug Discovery) पर फोकस कर रही हैं। सरकार की ₹10,000 करोड़ की 'BioPharma Shakti' स्कीम और 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' रणनीति से सेक्टर में बड़े बदलाव की उम्मीद है।
भारतीय फार्मा इंडस्ट्री, जिसे लंबे समय से दुनिया की 'फार्मेसी' कहा जाता है, अब अपना फोकस बदल रही है। इंडियन सोसाइटी फॉर क्लिनिकल रिसर्च जैसे दिग्गज अब 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' की वकालत कर रहे हैं, ताकि विदेशों में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिक वापस भारत लौटें और यहां हाई-वैल्यू ड्रग डिस्कवरी को रफ्तार दें।
BioPharma Shakti: गेम चेंजर स्कीम
सरकार ने ₹10,000 करोड़ के बजट के साथ 'BioPharma Shakti' स्कीम लॉन्च की है। इस योजना का मकसद बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स की पूरी वैल्यू चेन को मजबूती देना है। इसके तहत 1,000 क्लिनिकल ट्रायल साइट्स और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (NIPERs) को आधुनिक बनाया जाएगा, जिससे जटिल रिसर्च जो पहले विदेशों में होती थी, अब भारत में ही संभव हो सकेगी।
इंफ्रास्ट्रक्चर और रेगुलेशन की चुनौतियां
सिर्फ फंडिंग काफी नहीं है। फिलहाल भारत में 'ट्रांसलेशनल रिसर्च लैब्स' की कमी है, जो मॉलिक्यूल को लैब से क्लिनिकल ट्रायल तक ले जाने में मदद करती हैं। इसके अलावा, रेगुलेटरी मंजूरियों में देरी के कारण भारतीय कंपनियां अक्सर ऑस्ट्रेलिया या यूरोप जैसे देशों का रुख करती हैं। अब चर्चा यह है कि सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) में एक समर्पित साइंटिफिक रिव्यू कैडर बनाया जाए, जिससे अप्रूवल प्रोसेस तेज हो सके।
निवेशकों के लिए जोखिम और संकेत
जेनेरिक दवाओं में वॉल्यूम का खेल होता है, लेकिन ड्रग डिस्कवरी में भारी-भरकम शुरुआती खर्च (R&D Cost) होता है। यहां सफलता की गारंटी कम होती है और रिस्क ज्यादा। निवेशकों को अब कंपनियों के रिसर्च खर्च और सरकारी रेगुलेशंस में हो रहे बदलावों पर बारीक नजर रखनी होगी, क्योंकि यही भविष्य में इनके मुनाफे और मार्जिन को तय करेंगे।
