भारत की बड़ी फार्मा कंपनियां अब कम मुनाफे वाले जेनेरिक दवाओं के कारोबार से हटकर हाई-वैल्यू इनोवेशन की तरफ बढ़ रही हैं। सरकार की PRIP स्कीम से इसे बड़ा सहारा मिल रहा है, लेकिन भारी खर्च और रेगुलेटरी रिस्क निवेशकों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं।
भारतीय फार्मा इंडस्ट्री एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। दशकों तक दुनिया भर में सस्ती जेनेरिक दवाएं सप्लाई करने के बाद, अब Sun Pharma, Biocon और Glenmark जैसी कंपनियां हाई-वैल्यू रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर फोकस कर रही हैं। इनका मकसद केवल कीमत और वॉल्यूम के दम पर प्रतिस्पर्धा करने के बजाय इनोवेटिव और स्पेशलिटी दवाएं बनाना है।
सरकार से मिल रहा बड़ा सपोर्ट
इस बदलाव के लिए सरकार ने 'Promotion of Research and Innovation in Pharma & MedTech' (PRIP) स्कीम शुरू की है। इसके तहत 41 प्रोजेक्ट्स के लिए ₹1,600 करोड़ की मंजूरी दी गई है। इस पहल के बाद प्राइवेट सेक्टर का निवेश भी ₹3,000 करोड़ के पार पहुंच गया है। उदाहरण के तौर पर, Sun Pharma ने अकेले FY2025-26 में R&D पर ₹3,474.1 करोड़ खर्च किए हैं, जो इस क्षेत्र में बड़े निवेश की गंभीरता को दर्शाता है।
रिस्क और चुनौतियां
हालांकि, रिसर्च-बेस्ड बिजनेस मॉडल में शिफ्ट होना आसान नहीं है। नई दवा खोजने में लंबा समय और भारी पैसा लगता है। फिलहाल भारतीय कंपनियां अपने रेवेन्यू का केवल 7-8% ही R&D पर खर्च कर रही हैं, जबकि ग्लोबल लेवल पर यह 15-25% है। यह गैप कम करने से कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ना तय है।
इसके अलावा, रेगुलेटरी मोर्चे पर चुनौतियां बनी हुई हैं। FY2025 में US FDA की तरफ से जारी वार्निंग लेटर्स में 60% भारतीय फैसिलिटीज से संबंधित थे। क्वालिटी मानकों में चूक होने पर इंपोर्ट बैन या भारी जुर्माना लग सकता है, जो निवेशकों के लिए बड़ा झटका हो सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
आगे चलकर कंपनियों की कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि वे अपने कैपिटल का इस्तेमाल कितनी कुशलता से करती हैं। निवेशकों को सिर्फ रेवेन्यू ग्रोथ ही नहीं, बल्कि R&D पाइपलाइन की क्वालिटी, क्लीनिकल ट्रायल्स की सफलता और US FDA की मंजूरी को ध्यान से मॉनिटर करना चाहिए।
