Indian Pharma: जेनेरिक से आगे बढ़कर इनोवेशन की ओर! - सेक्टर के लीडर्स की बड़ी राय

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AuthorMehul Desai|Published at:
Indian Pharma: जेनेरिक से आगे बढ़कर इनोवेशन की ओर! - सेक्टर के लीडर्स की बड़ी राय
Overview

भारतीय फार्मा सेक्टर के दिग्गजों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि अब केवल जेनेरिक दवाओं (Generics) पर निर्भर रहने का दौर खत्म हो गया है। एक महत्वपूर्ण इवेंट में, टॉप लीडर्स ने स्पष्ट किया कि भविष्य में टिके रहने और ग्लोबल मार्केट में, खासकर चीन से मुकाबला करने के लिए 'इनोवेशन' (Innovation) ही एकमात्र रास्ता है; यह अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक बड़ी ज़रूरत बन गया है।

इनोवेशन ही Future, जेनेरिक पर निर्भरता खत्म!

दवा इंडस्ट्री के महारथियों ने साफ तौर पर कहा है कि अब सिर्फ जेनेरिक दवाओं के दम पर आगे बढ़ना मुश्किल होगा। 'मेड इन इंडिया: द स्टोरी ऑफ देश बंधु गुप्ता, ल्यूपिन एंड इंडियन फार्मा' (Made in India: The Story of Desh Bandhu Gupta, Lupin and Indian Pharma) नामक किताब के लॉन्च के मौके पर हुई चर्चा में, अनुभवी लीडर्स ने कहा कि कंपनियों का टिकाऊ विकास (sustained growth) अब असली 'इनोवेशन' पर ही निर्भर करेगा। सन फार्मा (Sun Pharma) के दिलीप सांघवी (Dilip Shanghvi) ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे उनकी कंपनी सिर्फ एक दवा से आगे बढ़कर जेनेरिक और नई थेरेपीज़ (novel therapies) में एक बड़ा नाम बनी है। उन्होंने R&D में भारी निवेश की बात कही, भले ही इसके नतीजे अनिश्चित हों।

चीन से बढ़ती सीधी चुनौती

इस चर्चा में चीन से बढ़ती प्रतिस्पर्धा पर भी गंभीर रूप से बात हुई। जी.वी. प्रसाद (GV Prasad) ने बताया कि चीन अब सिर्फ एक सस्ता सप्लायर नहीं रह गया है, बल्कि फार्मा इनोवेशन में एक मज़बूत ताकत बनकर उभरा है। वहां के रेगुलेटरी रास्ते (regulatory pathways) और सरकारी समर्थन (state support) ने चीन को वैल्यू चेन (value chain) में काफी ऊपर पहुंचा दिया है। यह भारत के लिए एक सीधी चुनौती है, जिसने अब तक कुछ खास सेगमेंट में अपनी धाक जमा रखी थी।

फोकस जेनेरिक से नई दवाओं की ओर

यह सच है कि भारत का फार्मा मार्केट अभी भी 97% तक जेनेरिक दवाओं पर टिका है। लेकिन, बायोसिमिलर (biosimilars) जैसे नए सेगमेंट में पहले से ही ब्रांडिंग (branding) और विश्वसनीयता (credibility) की ज़रूरत पड़ रही है, जो बदलते मार्केट के साफ संकेत हैं। ल्यूपिन (Lupin) की विनीता गुप्ता (Vinita Gupta) ने कहा कि अगले दशक में हमें भारत-केंद्रित 'इनोवेशन' और कम लागत वाली दवाओं के विकास पर अपना ध्यान केंद्रित करना होगा। पैनल का मानना था कि भारत के बड़े पेशेंट बेस का इस्तेमाल क्लिनिकल ट्रायल (clinical trials) के लिए करना और स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से R&D करना बड़े अवसर प्रदान कर सकता है।

सफलता के लिए ज़रूरी कदम

हालांकि, इन अवसरों का लाभ उठाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे। रेगुलेटरी समर्थन (regulatory support) को मज़बूत करना, R&D में रणनीतिक अधिग्रहण (strategic R&D acquisitions) करना और डॉक्टर्स, निवेशकों व कंपनियों का भरोसा जीतने के लिए शुरुआती जीत (early demonstrable wins) हासिल करना बहुत ज़रूरी होगा।

एक्सेस और अफोर्डेबिलिटी अभी भी कोर

भारत की जेनेरिक क्रांति के अगुवा माने जाने वाले वाई.के. हामीद (Y.K. Hamied) ने 'एक्सेस' (access) और 'अफोर्डेबिलिटी' (affordability) के अपने वादे को दोहराया। उन्होंने अपने मोनोपोली (monopolies) के खिलाफ संघर्ष और सस्ती HIV/AIDS दवाओं की सप्लाई के प्रयासों को याद किया। उनका मानना है कि जहां जेनेरिक दवाएं अपनी जगह बना चुकी हैं, वहीं अब भारतीय इनोवेशन को मेडिकल समुदाय में स्वीकृति दिलाना अगला बड़ा लक्ष्य है। यानी, ज़बरदस्त रिसर्च और 'दुनिया की फार्मेसी' वाली पहचान को बनाए रखने के बीच संतुलन साधना ही इस सेक्टर के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

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