देश की फार्मा कंपनियों ने NPPA के उस नए प्रस्ताव का विरोध शुरू कर दिया है, जिसमें दवाओं की ओवरप्राइसिंग के लिए केवल मैन्युफैक्चरर्स को जिम्मेदार ठहराने की बात कही गई है। इस बदलाव से निवेशकों के लिए रेगुलेटरी रिस्क और कंप्लायंस का खर्च बढ़ सकता है।
नियम पर विवाद क्यों?
NPPA (National Pharmaceutical Pricing Authority) का नया प्रस्ताव फार्मा सेक्टर में हलचल पैदा कर रहा है। इसके तहत अगर दवा एमआरपी (MRP) से ज्यादा कीमत पर बिकती है, तो उसकी पूरी जवाबदेही दवा निर्माता कंपनी की होगी। इंडस्ट्री का कहना है कि एक बार दवा बाजार में जाने के बाद, डिस्ट्रीब्यूटर और रिटेलर द्वारा की गई मनमानी कीमत के लिए कंपनी को दोषी मानना पूरी तरह गलत है।
इंडस्ट्री की मांग और स्टैंड
Federation of Pharma Entrepreneurs (FOPE) ने रेगुलेटर से इस प्रस्ताव को तुरंत रोकने की मांग की है। कंपनियों का तर्क है कि वे एमआरपी तय करने और अपना डेटा सबमिट करने की कानूनी प्रक्रिया पूरी करती हैं। वहीं दूसरी ओर, All India Organisation of Chemists and Druggists (AIOCD) जैसे रिटेलर ग्रुप्स छूट की मांग कर रहे हैं, जिससे यह पूरा मुद्दा सप्लाई चेन की जवाबदेही पर केंद्रित हो गया है।
निवेशकों के लिए संकेत
जून 2026 में आए DPCO (Drugs Prices Control Order) के संशोधन के बाद से यह सेक्टर लगातार बदलाव देख रहा है। अगर यह नया प्रस्ताव सख्ती से लागू होता है, तो कंपनियों पर कानूनी और ऑपरेशनल बोझ बढ़ सकता है। निवेशकों को आने वाले समय में NPPA के नोटिफिकेशन्स और कंपनियों के एक्सचेंज फाइलिंग्स पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यह सेक्टर के मार्जिन और रिस्क प्रोफाइल को प्रभावित कर सकता है।
