बढ़ती लागत और कमजोर एक्सपोर्ट का दोहरा झटका
इस मुश्किल की वजह है डॉलर (Dollar) के मुकाबले रुपये का कमजोर होना। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स (APIs) और केमिकल जैसे कई जरूरी सामानों की कीमतें डॉलर में तय होती हैं। ऐसे में, जब रुपया कमजोर होता है तो इंपोर्टेड चीजों की लागत बढ़ जाती है। वेस्ट एशिया (West Asia) में चल रहे संघर्ष ने सप्लाई चेन को और भी बाधित कर दिया है, जिससे रॉ मैटेरियल (Raw Material) और शिपिंग (Shipping) की लागत आसमान छू रही है। सरकार ने कुछ पेट्रोकेमिकल्स पर कस्टम ड्यूटी में राहत दी है, लेकिन कुल मिलाकर इनपुट कॉस्ट (Input Cost) अभी भी हाई बनी हुई है।
मार्च में एक्सपोर्ट में आई 23% से ज्यादा की गिरावट
आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2026 में भारतीय फार्मा एक्सपोर्ट (Pharma Exports) में 23.17% की भारी गिरावट आई, जो पिछले तीन सालों में पहली बार है। मार्च में एक्सपोर्ट $2.83 बिलियन पर आ गया। 2025-26 में एक्सपोर्ट में हल्की बढ़ोतरी हुई, लेकिन मार्च का यह आंकड़ा सेक्टर की चुनौतियों को साफ दिखाता है। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि डिमांड (Demand) की कमी नहीं है, बल्कि वेस्ट एशिया संघर्ष की वजह से लॉजिस्टिक्स (Logistics) की समस्याएँ बढ़ गई हैं। इससे शिपिंग में ज्यादा समय लग रहा है, माल भाड़ा (Freight Cost) महंगा हो गया है और दवाओं की सप्लाई जोखिम भरी हो गई है। अमेरिका (US) और यूरोप (Europe) के खरीदार भी ग्लोबल इकोनॉमिक स्लोडाउन (Global Economic Slowdown) के चलते सतर्क रुख अपना रहे हैं, जिससे ऑर्डर में देरी हो रही है।
हाई-वैल्यू दवाओं की ओर बढ़ता भारतीय फार्मा
इन चुनौतियों से निपटने के लिए, भारतीय दवा कंपनियाँ अब कम मार्जिन वाले जेनेरिक ड्रग्स (Generic Drugs) से हटकर ज्यादा वैल्यू वाले और कॉम्प्लेक्स प्रोडक्ट्स (Complex Products) पर फोकस कर रही हैं। इनमें कॉम्प्लेक्स जेनेरिक्स, बायोलॉजिक्स (Biologics), बायोसिमिलर्स (Biosimilars) और स्पेशियलिटी ड्रग्स (Specialty Drugs) शामिल हैं, जिनकी कीमतें ज्यादा होती हैं और पेटेंट प्रोटेक्शन (Patent Protection) भी लंबा मिलता है। कंपनियाँ रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग (Advanced Manufacturing) में भारी निवेश कर रही हैं। सरकार की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम लोकल APIs के प्रोडक्शन को बढ़ा रही है। हाल के उतार-चढ़ाव के बावजूद, निफ्टी फार्मा इंडेक्स (Nifty Pharma Index) ने मार्केट की तुलना में अच्छा प्रदर्शन किया है। सेक्टर का कुल मार्केट वैल्यू करीब ₹19.29 लाख करोड़ है, जिसका P/E रेश्यो 38.7 है, जो भविष्य के प्रति निवेशकों के विश्वास को दर्शाता है। कई कंपनियों की फाइनेंसियल पोजीशन (Financial Position) भी मजबूत है, जिससे वे R&D पर खर्च कर पा रही हैं।
नई रणनीति में भी छिपे हैं जोखिम
हालांकि, इस नई रणनीति में भी कई जोखिम बने हुए हैं। API के लिए चीन और अन्य देशों पर निर्भरता सप्लाई चेन में रुकावटों और करेंसी के उतार-चढ़ाव का खतरा बढ़ाती है। वेस्ट एशिया संकट ने इस भेद्यता को और उजागर किया है। कॉम्प्लेक्स जेनेरिक्स और बायोलॉजिक्स के क्षेत्र में उतरने के लिए भारी R&D निवेश और US FDA, EMA जैसी रेगुलेटरी बॉडीज (Regulatory Bodies) के कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। कंप्लायंस कॉस्ट (Compliance Cost) तेजी से बढ़ रही है। एनालिस्ट्स (Analysts) का कहना है कि जेनेरिक्स अभी भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके मार्जिन (Profit Margins) घट रहे हैं। अगर कंपनियाँ हाई-वैल्यू ड्रग्स की ओर सफलतापूर्वक शिफ्ट नहीं हो पातीं, तो मुनाफे पर असर पड़ सकता है।
आगे क्या है सेक्टर का आउटलुक?
एनालिस्ट्स को 2026 के लिए 7-9% की मध्यम वृद्धि का अनुमान है, जिसमें डोमेस्टिक सेल्स (Domestic Sales) और यूरोपीय बाज़ारों का योगदान होगा। स्पेशियलिटी प्रोडक्ट्स (Specialty Products) की बढ़त से प्रॉफिट मार्जिन मजबूत रहने की उम्मीद है। लंबी अवधि में, भारतीय फार्मा सेक्टर 2030 तक $120 बिलियन-$130 बिलियन का हो सकता है। यह ग्रोथ रेगुलेटरी चुनौतियों से निपटने, कॉम्प्लेक्स दवाओं में इनोवेशन (Innovation) और सप्लाई चेन के जोखिमों को कम करने पर निर्भर करेगी। सेक्टर अब वॉल्यूम (Volume) से वैल्यू (Value) पर फोकस कर रहा है, जिसका लक्ष्य कम लागत के बजाय क्वालिटी और रिलायबिलिटी (Reliability) के लिए वैश्विक पहचान बनाना है। हालाँकि, भू-राजनीतिक जोखिम (Geopolitical Risks) और ग्लोबल इकोनॉमिक स्लोडाउन (Global Economic Slowdown) योजनाओं को चुनौती देंगे।