वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में भारत का फार्मा एक्सपोर्ट **$8.1 बिलियन** तक पहुंच गया है। वेस्ट एशिया में लॉजिस्टिक मुश्किलों के बावजूद कंपनीज ने **6.8%** की ग्रोथ दर्ज की है, हालांकि बढ़ती फ्रेट कॉस्ट से प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव का खतरा बना हुआ है।
भारतीय फार्मा सेक्टर ने फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की शुरुआत मजबूती के साथ की है। जून के महीने में तो एक्सपोर्ट में 7.3% की बढ़त देखी गई, जो यह साबित करती है कि वैश्विक स्तर पर आ रही लॉजिस्टिक बाधाओं के बावजूद भारतीय कंपनियां अपना दबदबा बनाए हुए हैं।
डिमांड और मुख्य बाजार
ड्रग फॉर्मूलेशन और बायोलॉजिकल प्रोडक्ट्स अभी भी कुल शिपमेंट का करीब 74% हिस्सा हैं। अमेरिका हमारे फार्मा सेक्टर के लिए सबसे बड़ा बाजार है, जो कुल एक्सपोर्ट वैल्यू का करीब 31% हिस्सा खरीदता है। हालांकि, अमेरिका पर यह निर्भरता कंपनियों को रेगुलेटरी अपडेट्स और अमेरिकी जांचों के प्रति संवेदनशील भी बनाती है, जिससे प्रोडक्ट लॉन्च में देरी का रिस्क हमेशा बना रहता है।
लॉजिस्टिक्स और मार्जिन का टेंशन
एक्सपोर्ट के आंकड़े भले ही अच्छे दिख रहे हों, लेकिन वेस्ट एशिया में चल रहे जियो-पॉलिटिकल तनाव के कारण फ्रेट चार्जेस में भारी बढ़ोतरी हुई है। ट्रांसपोर्टेशन की यह बढ़ती लागत सीधे तौर पर ऑपरेटिंग मार्जिन को प्रभावित कर रही है। इन्वेस्टर्स के लिए यह एक बड़ा मॉनिटरेबल पॉइंट है कि कंपनियां इस लागत को ग्राहकों पर कितना डाल पाती हैं या कितना अपनी जेब से झेलती हैं।
सप्लाई चेन और सरकारी सपोर्ट
इंडस्ट्री अभी भी कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर है, जिसे बदलने की कोशिशें जारी हैं। इस जोखिम को कम करने के लिए सरकार की PLI स्कीम एक बड़ा सहारा बन रही है। कंपनियां अब एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) और की-स्टार्टिंग मटेरियल के लिए घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रही हैं। आगे चलकर यह सेक्टर अपनी लागत को कितना मैनेज कर पाता है, यही उसके शेयर प्राइस और मुनाफे की दिशा तय करेगा।
