भारत का हेल्थकेयर सेक्टर अब वन-टाइम ट्रीटमेंट से निकलकर लगातार पेशेंट केयर (continuous patient care) की ओर बढ़ रहा है। eSanjeevani जैसे डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल कर हॉस्पिटल चेन अब नए बिजनेस मॉडल पर काम कर रही हैं, जो निवेशकों के लिए भी अहम संकेत है।
भारत के हेल्थकेयर सेक्टर का बिजनेस मॉडल तेजी से बदल रहा है। अब तक अस्पताल 'एपिसोडिक' मॉडल पर चलते थे, जहां रेवेन्यू का जरिया एक सर्जरी, कंसल्टेशन या अस्पताल में भर्ती होना होता था। इसमें सारा जोर बेड ऑक्यूपेंसी (bed occupancy) पर रहता था। लेकिन अब सेक्टर 'लॉन्गिट्यूडिनल' यानी लगातार केयर मॉडल की ओर शिफ्ट हो रहा है, जिसका मकसद मरीज को महीनों या सालों तक अपने इकोसिस्टम में बनाए रखना है।
डिजिटल क्रांति बनी बड़ा आधार
इस बदलाव के पीछे सरकार का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बड़ी ताकत बनकर उभरा है। साल 2026 के अंत तक देश में 1.78 लाख आयुष्मान आरोग्य मंदिर स्थापित हो चुके हैं और नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों के लिए बने नेशनल सिस्टम में करीब 75 करोड़ लोग एनरोल हो चुके हैं। इसके अलावा, eSanjeevani प्लेटफॉर्म ने अगस्त 2026 तक 49 करोड़ से ज्यादा टेली-कंसल्टेशन कराकर यह साबित कर दिया है कि डिजिटल आउटरीच की ताकत कितनी बड़ी है।
बिजनेस के नए पैमाने
हॉस्पिटल चेन अब केवल बेड ऑक्यूपेंसी नहीं, बल्कि 'Patient Lifetime Value' पर फोकस कर रही हैं। इसका मतलब है एक मरीज से डायग्नोस्टिक्स, रिमोट मॉनिटरिंग और प्रिवेंटिव केयर के जरिए मिलने वाला कुल रेवेन्यू। इससे अस्पतालों को नए मरीज हासिल करने की लागत (acquisition cost) कम करने में मदद मिलेगी।
रिस्क और चुनौतियां
हालांकि, यह मॉडल जितना आकर्षक है, चुनौतियां भी उतनी ही हैं। टेक्नोलॉजी और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भारी निवेश की जरूरत है और इस बात की गारंटी नहीं है कि हर अस्पताल इसे सही तरीके से मोनेटाइज कर पाएगा। इसके अलावा, डेटा प्राइवेसी के कड़े नियम और ऑपरेशनल बदलाव करना बड़ी कंपनियों के लिए एक परीक्षा की तरह है। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि कंपनियां इन नए डिजिटल खर्चों और प्रॉफिट मार्जिन के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं।
