भारत की प्रमुख हॉस्पिटल कंपनियां **2030** तक **34,000** से ज्यादा बेड जोड़ने की तैयारी में हैं। लेकिन, **30%** से ज्यादा का हाई एट्रिशन रेट (Staff Attrition) इनके मुनाफे पर भारी पड़ रहा है।
भारी विस्तार और चुनौतियां
भारत का हेल्थकेयर सेक्टर इस समय बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर बदलाव से गुजर रहा है। Apollo Hospitals, Max Healthcare, Fortis Healthcare और Narayana Hrudayalaya जैसी दिग्गज कंपनियां 2030 तक 34,000 से अधिक नए बेड जोड़ने के प्लान पर काम कर रही हैं। यह विस्तार देश में बढ़ती स्वास्थ्य सेवाओं की मांग को पूरा करने के लिए है, लेकिन इसके सामने एक बड़ी बाधा खड़ी है—नर्सों और जूनियर डॉक्टरों के बीच 30% से ज्यादा का एट्रिशन रेट।
मार्जिन पर दबाव
निवेशकों के लिए स्थिति थोड़ी पेचीदा है। हालांकि फाइनेंशियल ईयर 2026 में रेवेन्यू और EBITDA ग्रोथ 15% के पार रही है, लेकिन नेट प्रॉफिट पर दबाव बना हुआ है। कुल EBITDA मार्जिन अभी भी 23% के आसपास स्थिर है। इसका कारण नए अस्पताल खोलने का खर्च और स्टाफ की भर्ती-ट्रेनिंग पर होने वाला भारी भरकम खर्च है।
रिटेंशन के लिए नए फॉर्मूले
इस संकट से निपटने के लिए कंपनियां अब ESOPs (Employee Stock Option Plans) का सहारा ले रही हैं ताकि टैलेंट को लंबे समय तक रोके रखा जा सके। इसके अलावा, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) की एक नई पॉलिसी पर भी चर्चा है, जिसके तहत प्राइवेट सेक्टर को खुद के मेडिकल कॉलेज खोलने की इजाजत मिल सकती है। Max Healthcare जैसे प्लेयर्स इस रास्ते पर विचार कर रहे हैं, ताकि भविष्य में डॉक्टरों की कमी न हो और बाहरी भर्ती पर निर्भरता घटे।
कर्ज और रिस्क
अस्पताल कंपनियां भारी कर्ज भी ले रही हैं। अर्ली 2026 तक सेक्टर का डेट-टू-EBITDA रेशियो 2.4 से 2.6 गुना के बीच है। यह लेवल फिलहाल कंट्रोल में है, लेकिन अगर बेड भरने में देरी हुई या वेतन का खर्च (Wage Inflation) बढ़ता रहा, तो कैश फ्लो पर असर पड़ सकता है।
निवेशकों को अब कंपनी के ऑपरेशनल एग्जीक्यूशन पर नजर रखनी चाहिए। बेड ऑक्यूपेंसी रेट ही वह पैमाना होगा जो तय करेगा कि कंपनियां इस बढ़ते खर्च के बावजूद अपना मुनाफा कैसे बढ़ाती हैं।
