भारत में लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं महंगी होती जा रही हैं। साल 2022-23 में प्रति व्यक्ति जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च **28%** बढ़कर **₹2,767** पर पहुंच गया है। वहीं, मेडिकल इन्फ्लेशन (medical inflation) सालाना **11-13%** की दर से बढ़ रहा है, जिससे परिवारों पर वित्तीय दबाव साफ दिख रहा है।
जेब पर सीधा असर: 5 साल में 28.4% की बढ़ोतरी
सरकार के नए आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच सालों में प्रति व्यक्ति जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च (Out-of-Pocket Healthcare Spending - OOPE) 28.4% बढ़कर ₹2,767 हो गया है। यह वो पैसा है जो लोग सीधे अस्पतालों, दवाइयों और जांचों पर खर्च करते हैं, और जिसका कवर बीमा से नहीं होता। 2018-19 में यह आंकड़ा ₹2,155 था, जो अब काफी बढ़ गया है।
मेडिकल इन्फ्लेशन: एक साइलेंट बोझ
निवेशकों और बाजार पर नजर रखने वालों के लिए यह ट्रेंड एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है - मेडिकल इन्फ्लेशन। रिपोर्टों के अनुसार, स्वास्थ्य सेवाओं की लागत सालाना 11-13% तक बढ़ रही है, जो आम महंगाई दर से कहीं ज्यादा है। इसका मतलब है कि लोगों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा इलाज पर ही खर्च हो रहा है, और बाकी चीजों के लिए कम पैसा बच रहा है।
नौकरी से ज़्यादा चिंता: इलाज का खर्च
बढ़ती लागत का असर नौकरीपेशा लोगों पर भी दिख रहा है। टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस के एक सर्वे में पाया गया कि 94% कॉर्पोरेट कर्मचारी अचानक होने वाले मेडिकल खर्चों से परेशान हैं। यह चिंता, नौकरी की सुरक्षा या लोन चुकाने से भी ज़्यादा बड़ी हो गई है। इसी वजह से लोग अब फाइनेंशियल प्रोटेक्शन, यानी हेल्थ इंश्योरेंस (health insurance) पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं।
राज्यों में बड़ा अंतर
यह फाइनेंशियल बोझ हर राज्य में एक जैसा नहीं है। केरल में प्रति व्यक्ति OOPE सबसे ज़्यादा ₹8,388 है, जो राष्ट्रीय औसत से तीन गुना से भी ज़्यादा है। वहीं, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी खर्च ज़्यादा है, जबकि बिहार और असम में यह कम है। यह अंतर वहां की स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता और लागत पर निर्भर करता है।
सरकारी पहलें और इंश्योरेंस का भविष्य
सरकार इस बोझ को कम करने के लिए आयुष्मान भारत, नेशनल हेल्थ मिशन जैसी कई योजनाएं चला रही है। जन औषधि केंद्रों का विस्तार भी किया जा रहा है।
आगे चलकर, निवेशकों के लिए इंश्योरेंस सेक्टर पर नज़र रखना महत्वपूर्ण होगा। जब तक जेब से होने वाला खर्च एक बड़ी समस्या बना रहेगा, तब तक हेल्थ इंश्योरेंस और बेहतर मेडिकल सेवाओं की मांग बनी रहेगी। इंश्योरेंस का प्रसार किस रफ़्तार से बढ़ता है, यह कंज्यूमर और इंश्योरेंस मार्केट के लिए एक अहम इंडिकेटर होगा।
