अमेरिकी बाज़ार में भारी गिरावट, घरेलू बाज़ार का सहारा
FY26 की चौथी तिमाही के नतीजों में भारतीय फार्मा सेक्टर (Indian Pharma Sector) एक मिलीजुली तस्वीर पेश कर रहा है। जहां एक ओर अमेरिकी जेनेरिक्स (US Generics) बाजार से होने वाली कमाई में बड़ी गिरावट आई है, वहीं दूसरी ओर भारत के घरेलू बाजार (Domestic Market) में हुई जोरदार बिक्री ने इस घाटे को काफी हद तक पाट दिया। अनुमान है कि पूरे सेक्टर का रेवेन्यू (Revenue) करीब 12% बढ़ेगा, लेकिन मार्जिन पर दबाव के कारण नेट प्रॉफिट (Net Profit) में 14% की साल-दर-साल गिरावट आ सकती है।
Revlimid का पेटेंट खत्म, Dr. Reddy's और Cipla पर असर
अमेरिकी बाजार में Revlimid जैसी दवाओं के पेटेंट (patent) का खत्म होना एक बड़ा कारण रहा, जिसने कई बड़ी भारतीय दवा कंपनियों की कमाई पर गहरा असर डाला। Dr. Reddy's Laboratories, Cipla और Zydus Lifesciences, जो इस दवा की बिक्री पर काफी हद तक निर्भर थीं, को लाभ में भारी गिरावट का सामना करना पड़ा। Systematix के अनुमान के अनुसार, Cipla की अमेरिकी बिक्री में 22% और Dr. Reddy's की बिक्री में 37% की गिरावट आ सकती है, जिससे उनका अमेरिकी कारोबार वापस Revlimid से पहले के स्तर पर पहुँच सकता है। Cipla को Lanreotide दवा की सप्लाई में रुकावटों का भी सामना करना पड़ा।
घरेलू मांग बनी बड़ी ताकत
भारतीय दवा कंपनियों के लिए घरेलू फॉर्मूलेशन बाजार (Domestic Formulations Market) एक मजबूत सहारा साबित हुआ है। ज़्यादातर बड़ी भारतीय दवा कंपनियों ने अपने घरेलू कारोबार में डबल-डिजिट ग्रोथ (double-digit growth) दर्ज की है। यह ग्रोथ पुरानी और सामान्य बीमारियों के इलाज के लिए दवाओं की स्थिर मांग, और नए प्रोडक्ट्स के सफल लॉन्च के कारण संभव हुई। Sun Pharma, Cipla, Dr. Reddy's, Mankind Pharma और Ajanta Pharma जैसी कंपनियों से घरेलू बिक्री में लो-टू-मिड टीन ग्रोथ (low-to-mid teen growth) की उम्मीद है।
भू-राजनीतिक तनाव से बढ़ी लागतें, मार्जिन पर दबाव
मध्य-पूर्व (Middle East) में जारी भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) के कारण शिपिंग (shipping) और कच्चे माल (raw materials) की लागतें बढ़ गई हैं, जिससे कंपनियों की लाभप्रदता (profitability) पर दबाव बढ़ा है। बढ़ते फ्रेट सरचार्ज (freight surcharges) और शिपिंग रूट (shipping routes) के कारण कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी पर असर पड़ा है, और यह बढ़ी हुई लागतें, रुपये के कमजोर होने से मिलने वाले फायदों को काफी हद तक खत्म कर रही हैं।
Lupin और Ajanta Pharma का दमदार प्रदर्शन
सेक्टर की इन चुनौतियों के बावजूद, Lupin और Ajanta Pharma जैसी कुछ कंपनियों ने अपने मजबूत परफॉरमेंस से सबको चौंकाया है। Lupin की कमाई Tolvaptan दवा की एक्सक्लूसिविटी (exclusivity) और सफल निश (niche) प्रोडक्ट्स के लॉन्च से बढ़ी है। Ajanta Pharma का अमेरिकी कारोबार भी स्पेशलाइज्ड प्रोडक्ट्स के दम पर आगे बढ़ रहा है।
वैल्यूएशन और करेंसी का असर
बाजार में अलग-अलग कंपनियों के वैल्यूएशन मल्टीपल्स (Valuation multiples) में काफी अंतर है। Sun Pharma का P/E अनुपात करीब 36.7 है, जो Dr. Reddy's (18.4) और Zydus Lifesciences (18.9) से काफी अधिक है। Cipla का P/E 21.7, Lupin का 22.8 और Ajanta Pharma का 34.4 के आसपास है। रुपये का कमजोर होना ($90 के पार) निर्यातकों के लिए फायदे का सौदा है, लेकिन आयातित कच्चे माल की बढ़ी कीमतों के कारण यह फायदा सीमित हो रहा है।
आगे की राह में जोखिम और उम्मीदें
आगे चलकर, US जेनेरिक्स बाजार में लगातार हो रही मूल्य गिरावट (price erosion), भू-राजनीतिक तनावों का बढ़ना, और कुछ प्रमुख उत्पादों पर निर्भरता प्रमुख जोखिम बने रहेंगे। कंपनियां प्रोडक्ट पोर्टफोलियो (product portfolio) में विविधता लाने और लागत नियंत्रण (cost discipline) पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रेवेन्यू में मामूली वृद्धि जारी रह सकती है, लेकिन बढ़ती लागतों और प्रतिस्पर्धा के कारण लाभ मार्जिन पर दबाव बना रहेगा।
