भारत की CRDMO कंपनियों ने फाइनेंशियल ईयर **2021** से **2026** के बीच अपने कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) में **93%** की भारी बढ़ोतरी की है। कंपनियां अब जेनेरिक से आगे बढ़कर हाई-वैल्यू ड्रग मार्केट पर दांव लगा रही हैं, लेकिन निवेशकों को एग्जीक्यूशन रिस्क पर नजर रखनी चाहिए।
भारत की कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग (CRDMO) कंपनियां एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही हैं। डेटा के मुताबिक, इस सेक्टर की नौ प्रमुख कंपनियों ने फाइनेंशियल ईयर 2021 से 2026 के बीच अपने खर्च में 93% का बड़ा इजाफा किया है। यह आक्रामक निवेश बेसिक मैन्युफैक्चरिंग से हटकर हाई-वैल्यू और कॉम्प्लेक्स सेगमेंट की ओर एक बड़ी रणनीति है।
किन कंपनियों पर है फोकस?
Divi’s Laboratories, Laurus Labs, Piramal Pharma, Blue Jet Healthcare और Sai Life Sciences जैसी दिग्गज कंपनियां अब एंटीबॉडी-ड्रग कॉन्जुगेट्स, पेप्टाइड्स और हाई-पोटेंट एक्टिव फार्मास्यूटिकल्स जैसे जटिल तकनीकों में पैसा लगा रही हैं। ये उत्पाद सामान्य जेनेरिक दवाओं की तुलना में बनाने में कहीं अधिक कठिन हैं, जो भारतीय कंपनियों को ग्लोबल मार्केट में एक बड़ा फायदा दिला सकते हैं।
क्यों बदल रही है रणनीति?
भारतीय कंपनियां अब ग्लोबल फार्मा दिग्गजों के लिए केवल मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर नहीं, बल्कि रिसर्च एंड डेवलपमेंट के फेज में भी इंटीग्रेटेड पार्टनर बनना चाहती हैं। इसका मकसद सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना और जेनेरिक मार्केट के प्राइस वॉर से बाहर निकलना है।
निवेशकों के लिए क्या हैं रिस्क?
- हाई कॉस्ट और डेप्रिसिएशन: इन फैसिलिटीज के लिए बहुत बड़ा शुरुआती निवेश चाहिए, जिससे शॉर्ट टर्म में ब्याज और डेप्रिसिएशन का बोझ बढ़ेगा।
- समय की चुनौती: बायोलॉजिक्स जैसी कॉम्प्लेक्स दवाओं के लिए वैलिडेशन में सालों लग सकते हैं, जिससे प्रॉफिट में असर दिखने में देरी हो सकती है।
- रेगुलेटरी रिस्क: US FDA जैसे रेगुलेटर्स की मंजूरी में देरी या ऑडिट के मुद्दों का असर सीधे मुनाफे पर पड़ सकता है।
निवेशकों के लिए सलाह है कि वे इन कंपनियों की नई कैपेसिटी का यूटिलाइजेशन रेट और मैनेजमेंट की ऑर्डर बुक ग्रोथ पर बारीकी से नजर रखें।
