रेबीज पर भारत का कड़ा एक्शन! ₹56.8 करोड़ की ओर बढ़ता वैक्सीन बाज़ार

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
रेबीज पर भारत का कड़ा एक्शन! ₹56.8 करोड़ की ओर बढ़ता वैक्सीन बाज़ार

भारत सरकार ने रेबीज से होने वाली हर संदिग्ध मौत की जांच के लिए एक नया मल्टी-एजेंसी प्रोटोकॉल लागू किया है। इसमें स्वास्थ्य, पशुपालन और स्थानीय प्रशासन मिलकर काम करेंगे। सरकार के इस 'वन हेल्थ' (One Health) अप्रोच का मकसद बढ़ती मौतों पर लगाम लगाना है। साथ ही, यह कदम ऐसे समय पर आया है जब प्रिवेंटिव केयर (preventive care) की मांग बढ़ रही है और अनुमान है कि भारतीय रेबीज वैक्सीन बाज़ार **2030** तक **$56.8 मिलियन** (लगभग **₹470 करोड़**) तक पहुंच जाएगा।

रेबीज से लड़ाई का नया तरीका

राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (National Centre for Disease Control) के नेतृत्व में, भारत सरकार अब रेबीज से होने वाली संदिग्ध मानवीय मौतों की जांच के लिए एक ज़्यादा सख़्त, मल्टी-एजेंसी प्रोटोकॉल अपना रही है। इस पहल के तहत संक्रमण के स्रोत का तेज़ी से पता लगाना और संपर्क ट्रेसिंग (contact tracing) पर ज़ोर दिया जाएगा, ताकि समय पर मेडिकल मदद दी जा सके। यह एक बड़ा बदलाव है कि देश अब रेबीज के लगातार बने और जानलेवा खतरे से निपटने के लिए एक व्यवस्थित तरीका अपना रहा है।

'वन हेल्थ' अप्रोच को कैसे करेंगे लागू?

यह नया स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) सिर्फ़ एक विभाग की ज़िम्मेदारी नहीं है। अब स्वास्थ्य, पशुपालन और स्थानीय नगर निगम निकाय मिलकर राष्ट्रीय, राज्य और ज़िला स्तर पर एक टीम की तरह काम करेंगे। स्वास्थ्य सुविधाओं को अब किसी संदिग्ध मौत के 24 घंटे के भीतर इंटीग्रेटेड हेल्थ इन्फॉर्मेशन प्लेटफॉर्म (Integrated Health Information Platform) पर जानकारी अपडेट करनी होगी। इसके बाद, संयुक्त टीमें 48 घंटे के अंदर फील्ड जांच शुरू करेंगी ताकि काटने की घटनाओं का पता लगाया जा सके, टीकाकरण रिकॉर्ड की पुष्टि की जा सके और एक्सपोजर क्लस्टर (exposure clusters) की मैपिंग की जा सके। इसका लक्ष्य सात दिनों के भीतर अंतिम रिपोर्ट देना है।

हेल्थकेयर के लिए बाज़ार पर असर

हेल्थकेयर और फार्मास्युटिकल सेक्टर के लिए, रेबीज पर यह बढ़ा हुआ फोकस प्रिवेंटिव केयर (preventive care) और वैक्सीन की उपलब्धता पर ज़ोर देने की ओर इशारा करता है। आंकड़ों के अनुसार, 2024 में कुत्तों के काटने की घटनाएं बढ़कर 3.72 मिलियन हो गईं, जबकि पिछले साल यह 2.75 मिलियन थीं। वहीं, रेबीज से होने वाली मौतें 2022 में 22 से बढ़कर 2024 में 180 हो गईं। जागरूकता और सरकारी कार्रवाई में इस वृद्धि से पशुओं और मनुष्यों दोनों के लिए रेबीज वैक्सीन की मांग बने रहने की उम्मीद है। बाज़ार के अनुमान बताते हैं कि फिलहाल लगभग $37.6 मिलियन (लगभग ₹310 करोड़) का घरेलू रेबीज वैक्सीन बाज़ार, 2030 तक $56.8 मिलियन (लगभग ₹470 करोड़) तक बढ़ सकता है। इस वृद्धि की वजह स्ट्रीट डॉग मैनेजमेंट (street dog management) पर म्युनिसिपल खर्च में बढ़ोतरी और पालतू जानवरों के मालिकों में बढ़ती जागरूकता है।

कार्यान्वयन में चुनौतियाँ

इस व्यवस्थित पॉलिसी के बावजूद, इस पहल को स्पष्ट ऑपरेशनल बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। इसकी सफलता विभिन्न सरकारी विभागों के बीच प्रभावी समन्वय पर निर्भर करेगी, जिसमें अक्सर नौकरशाही देरी का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, दूरदराज या ग्रामीण इलाकों में एंटी-रेबीज वैक्सीन (anti-rabies vaccines) और इम्यूनोग्लोबुलिन (immunoglobulins) की उपलब्धता सुनिश्चित करने की लॉजिस्टिकल चुनौती बनी हुई है। अगली महत्वपूर्ण बातें जिन पर नज़र रखी जाएगी, वे हैं विभिन्न विभागों के बीच सहयोग की क्षमता, वैक्सीन खरीद की गति और क्या 48 घंटे की नई जांच की अनिवार्यता संक्रमण के संपर्क में आए लोगों के लिए समय पर इलाज में सुधार लाएगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.