लैब डेटा के आधार पर बड़ी कार्रवाई
यह अहम कदम ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI), राजीव सिंह रघुवंशी के आदेश पर उठाया गया है। DCGI ने साफ किया है कि यह कार्रवाई सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और दवाओं के नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए है। यह कदम लैब टेस्ट डेटा के विश्लेषण के बाद उठाया गया है, जिसमें पाया गया कि ये अनधिकृत दवा फॉर्मूलेशन स्वास्थ्य के लिए 'गंभीर चिंता' का विषय हैं। इन दवाओं में डायबिटीज, मल्टीविटामिन और आयरन सप्लीमेंट्स जैसी श्रेणियों की दवाएं शामिल हैं।
नियमों का उल्लंघन और कड़े निर्देश
DCGI ने जोर देकर कहा है कि ये दवाएं 'ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940' का उल्लंघन करती हैं। राज्य के नियामकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि किसी भी स्थानीय गलत अप्रूवल को रोका जाए। साथ ही, मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस मिलने से पहले यह जांचा जाए कि निर्माताओं के पास 'NDCT रूल्स, 2019' के 'रूल 83' के अनुसार केंद्रीय मंजूरी है या नहीं।
पुराना है अनअप्रूव्ड दवाओं का खेल
यह पहली बार नहीं है जब ऐसी कार्रवाई हो रही है। 2012 की एक संसदीय समिति की रिपोर्ट में भी ऐसी ही समस्याओं का जिक्र किया गया था, जहां राज्य अधिकारियों ने केंद्रीय मंजूरी के बिना FDC के लिए लाइसेंस जारी कर दिए थे। इससे बिना जांच वाली दवाएं बाजार में फैल गईं। भारत में पहले भी अनअप्रूव्ड और 'अतिरिक्त' (irrational) FDCs पर कार्रवाई हुई है। 2018 में 328 और 2024 में 156 ऐसी दवाओं पर बैन लगाया गया था। 2020 में अनअप्रूव्ड FDCs की बिक्री, साइकोट्रोपिक दवाओं की कुल बिक्री का 60% तक पहुंच गई थी।
छोटी कंपनियों पर पड़ेगा ज़्यादा असर
₹60.32 बिलियन के भारतीय फार्मा मार्केट पर इस सख्ती का असर खास तौर पर छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों (SMEs) पर पड़ सकता है। जिन कंपनियों के पास बहुत सारी अनअप्रूव्ड या 'अतिरिक्त' FDCs हैं, उन्हें अपने प्रोडक्ट्स वापस लेने पड़ सकते हैं या मैन्युफैक्चरिंग रोकनी पड़ सकती है। सख्त गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेस (GMP) को पूरा करने और नए अप्रूवल पाने का खर्च कई कंपनियों के लिए भारी पड़ सकता है। इससे मार्केट में कंसॉलिडेशन (समेकन) तेज हो सकता है, जिससे बड़ी कंपनियां फायदा उठा सकती हैं।
भविष्य की राह: क्वालिटी और ग्लोबल स्टैंडर्ड
भारतीय फार्मा इंडस्ट्री के फाइनेंशियल ईयर 2026 तक 7-9% की ग्रोथ का अनुमान है। यह रेगुलेटरी एक्शन, हालांकि थोड़े समय के लिए दिक्कतें पैदा कर सकता है, लेकिन यह सेक्टर के परिपक्व होने और अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता व सुरक्षा मानकों के साथ बेहतर तालमेल बिठाने का संकेत देता है। भारत अपनी वैश्विक पहचान को मजबूत करने, इंपोर्टेड कच्चे माल पर निर्भरता कम करने और अपने रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को बेहतर बनाने का लक्ष्य रख रहा है। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम जैसी सरकारी पहल के साथ, यह कदम इंडस्ट्री को हाई-वैल्यू, कंप्लायंट मैन्युफैक्चरिंग की ओर ले जाएगा।
