भारत सरकार ने मेडिकल डिवाइस बनाने के लाइसेंस (License) के अप्रूवल टाइमलाइन को कम करने का प्रस्ताव दिया है। क्लास B डिवाइसेस के लिए इसे **140** दिनों से घटाकर **115** दिन और क्लास C व D डिवाइसेस के लिए **105** दिनों से घटाकर **90** दिन किया जाएगा।
क्या हुआ है?
केंद्र स्वास्थ्य मंत्रालय ने मेडिकल डिवाइसेस रूल्स, 2017 में ड्राफ्ट अमेंडमेंट पेश किया है। इसका मकसद भारत में मेडिकल डिवाइस बनाने के लिए मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को तेज करना है। इस प्रस्ताव के तहत, क्लास B डिवाइसेस (जैसे ब्लड प्रेशर मॉनिटर, हाइपोडर्मिक नीडल) के लिए अप्रूवल का समय 140 दिनों से घटाकर 115 दिन कर दिया जाएगा। वहीं, हाई-रिस्क वाले क्लास C और क्लास D डिवाइसेस (जैसे कार्डियक स्टेंट, कॉम्प्लेक्स मेडिकल इम्प्लांट) के लिए यह समय सीमा 105 दिनों से घटाकर 90 दिन करने का प्रस्ताव है।
बिजनेस के लिए क्यों अहम?
घरेलू मेडिकल डिवाइस बनाने वाली कंपनियों के लिए समय बहुत कीमती है। अभी अप्रूवल प्रोसेस में लगने वाला लंबा समय नए प्रोडक्ट्स को बाजार में लाने में देरी कर देता है। समय सीमा घटाने से कंपनियों को अपने प्रोडक्ट्स जल्दी लॉन्च करने में मदद मिलेगी, जिससे वे तेजी से रेवेन्यू जेनरेट कर सकेंगी। इससे उनकी ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Operational Efficiency) भी सुधरेगी क्योंकि वे अप्रूवल का इंतजार करने के बजाय प्रोडक्शन और सेल्स पर ज्यादा ध्यान दे पाएंगी।
'मेक इन इंडिया' का असर
यह कदम सरकार के 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। भारतीय मेडिकल डिवाइस सेक्टर अभी भी टेक्नोलॉजी और हार्डवेयर के लिए काफी हद तक विदेशी बाजारों पर निर्भर है। रेगुलेटरी बाधाओं को कम करके, सरकार चाहती है कि घरेलू कंपनियां अपनी उत्पादन क्षमता आसानी से बढ़ा सकें। यह प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम जैसी पहलों का भी हिस्सा है, जिनका मकसद स्थानीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से बेहतर तरीके से मुकाबला करने में मदद करना है।
क्वालिटी और रेगुलेशन का संतुलन
हालांकि इंडस्ट्री ने तेज टाइमलाइन का स्वागत किया है, लेकिन निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि रफ्तार बढ़ने का मतलब क्वालिटी से समझौता नहीं है। लाइसेंसिंग प्रक्रिया में अभी भी सख्त जांच, नोटिफाइड बॉडीज द्वारा ऑडिट और कंप्लायंस वेरिफिकेशन शामिल होगा। इस बदलाव की असली कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) इन ऑडिट्स को नई, छोटी समय-सीमा में कितनी कुशलता से मैनेज करता है। तेज टाइमलाइन से रेगुलेटर्स और मैन्युफैक्चरर्स दोनों पर दबाव बढ़ेगा कि वे डॉक्यूमेंटेशन और कंप्लायंस चेक्स को बिना किसी गलती के पूरा करें ताकि रिजेक्शन या देरी से बचा जा सके।
आगे क्या देखें?
हेल्थकेयर मैन्युफैक्चरिंग स्पेस पर नजर रखने वाले निवेशकों को अब आधिकारिक गजट में इन नियमों की फाइनल नोटिफिकेशन का इंतजार करना चाहिए। नियम बदलने के अलावा, इसका असली असर ग्राउंड पर कितनी तेजी से लागू होता है, यह देखना होगा। मुख्य इंडिकेटर्स पर नजर रखें, जैसे कि क्या कंपनियां आने वाली तिमाही रिपोर्ट में उम्मीद से जल्दी प्रोडक्ट लॉन्च की रिपोर्ट करती हैं और क्या रेगुलेटरी ऑडिट्स बिना किसी बढ़ी हुई रिजेक्शन रेट के सुचारू रूप से आगे बढ़ते हैं। प्रमुख लिस्टेड मेडिकल डिवाइस मैन्युफैक्चरर्स से उनके R&D पाइपलाइन और लॉन्च शेड्यूल पर मैनेजमेंट की कमेंट्री से यह समझने में मदद मिलेगी कि यह पॉलिसी बदलाव उनके बिजनेस ग्रोथ को कैसे प्रभावित करता है।
