कैंसर के इलाज में क्रांति लाने के लिए डॉ. भावना सिरोही ने एक **5-वर्षीय** नेशनल पॉलिसी की मांग की है। इसके तहत जेनोमिक टेस्टिंग और सटीक इलाज को आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं का हिस्सा बनाया जा सकता है, जो डायग्नोस्टिक और फार्मा सेक्टर के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
भारत में कैंसर के इलाज का भविष्य अब 'प्रेसिजन ऑन्कोलॉजी' की ओर बढ़ रहा है, जहाँ मरीज के जेनेटिक प्रोफाइल के आधार पर इलाज किया जाता है। वेदांता मेडिकल रिसर्च फाउंडेशन-BALCO मेडिकल सेंटर की मेडिकल डायरेक्टर डॉ. भावना सिरोही ने सरकार से इस दिशा में एक 5-वर्षीय राष्ट्रीय नीति बनाने का आग्रह किया है। यह कदम पारंपरिक कीमोथेरेपी से हटकर डीएनए-आधारित आधुनिक इलाज की ओर एक बड़ा बदलाव है।
डायग्नोस्टिक और फार्मा सेक्टर पर असर
प्रेसिजन केयर की तरफ बढ़ते इस कदम से डायग्नोस्टिक लैब्स और फार्मा कंपनियों को सीधा फायदा मिलने की उम्मीद है। बड़ी डायग्नोस्टिक चेन पहले से ही Next-Generation Sequencing (NGS) तकनीक में निवेश कर रही हैं। यदि जेनोमिक टेस्टिंग को 'आयुष्मान भारत' जैसी सरकारी योजनाओं में जगह मिलती है, तो टेस्टिंग वॉल्यूम में जबरदस्त उछाल देखने को मिल सकता है। हालांकि, निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या सरकार इन सेवाओं के लिए कोई प्राइस कैप तय करेगी, जो मार्जिन को प्रभावित कर सकता है।
फार्मा कंपनियों के लिए, फोकस अब पारंपरिक दवाओं से हटकर टारगेटेड थेरेपी और बायोसिमिलर दवाओं की ओर शिफ्ट हो रहा है। भले ही ये दवाएं महंगी हों, लेकिन बेहतर नतीजों के कारण इनकी मांग बढ़ रही है।
चुनौतियां और चुनौतियां
इस योजना को लागू करने में इंफ्रास्ट्रक्चर और टैलेंट की कमी एक बड़ी बाधा है। फिलहाल, मॉलिक्यूलर पैथोलॉजिस्ट और जेनेटिसिस्ट जैसी विशेषज्ञता सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित है। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में बीमारी के बोझ को समझने के लिए किए जा रहे प्रयासों के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों तक इस सुविधा को पहुँचाना एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती है।
निवेशकों के लिए अहम मॉनिटरेबल
आने वाले समय में, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार जेनोमिक टेस्टिंग को बीमा फ्रेमवर्क में कैसे एकीकृत करती है। इसके अलावा, सरकारी बजट एलोकेशन, ड्रग प्राइसिंग रेगुलेशन और डायग्नोस्टिक लैब्स की प्रॉफिटेबिलिटी बनाए रखने की क्षमता इस सेक्टर के भविष्य को तय करेगी।
