स्टेम सेल थेरेपी पर भारत की बड़ी रोक: अब सिर्फ रिसर्च के लिए मिलेगी मंजूरी

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
स्टेम सेल थेरेपी पर भारत की बड़ी रोक: अब सिर्फ रिसर्च के लिए मिलेगी मंजूरी

भारत सरकार ने माइक्रोवैस्कुलर (छोटी रक्त वाहिकाओं से जुड़ी) बीमारियों के इलाज के लिए स्टेम सेल थेरेपी के नियमित क्लिनिकल इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। अब इसका उपयोग केवल स्वीकृत रिसर्च ट्रायल तक ही सीमित रहेगा।

स्वास्थ्य मंत्रालय और स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग ने नई गाइडलाइंस जारी करते हुए साफ कर दिया है कि छोटी रक्त वाहिकाओं से जुड़ी समस्याओं, जैसे कि क्रिटिकल लिम्ब इस्किमिया (Critical Limb Ischemia) और लंबे समय से ठीक न होने वाले घावों के इलाज के लिए स्टेम सेल थेरेपी को अब आम मेडिकल इलाज के तौर पर नहीं बेचा जा सकेगा। सरकार ने कहा है कि इन स्थितियों के लिए स्टेम सेल थेरेपी की सुरक्षा और प्रभावशीलता के पुख्ता सबूतों का अभाव है, इसलिए इसे केवल कड़ी निगरानी वाले रिसर्च ट्रायल तक ही सीमित रखा जाएगा।

मेडिकल बिजनेस मॉडल्स पर बड़ा असर

पिछले कुछ सालों से कई प्राइवेट क्लीनिक और हेल्थकेयर कंपनियां विभिन्न बीमारियों के समाधान के तौर पर स्टेम सेल थेरेपी का विज्ञापन कर रही थीं। इस नए सरकारी आदेश से उनके बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव आएगा। जो कंपनियां सख्त क्लिनिकल ट्रायल के बाहर इन ट्रीटमेंट्स की पेशकश करके कमाई कर रही थीं, उन्हें अब बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। यह कदम सरकार द्वारा बिना किसी जांच-परख के किए जा रहे व्यावसायिक अभ्यासों पर नकेल कसने का हिस्सा है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और नियामक सख्ती

हेल्थकेयर और बायोटेक्नोलॉजी सेक्टर में निवेशकों को इस फैसले के कानूनी पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए। यह प्रतिबंध जनवरी 2026 में आए सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के बाद आया है, जिसमें बिनाproven स्टेम सेल थेरेपी को बढ़ावा देना पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) करार दिया गया था। उस फैसले के बाद से, नेशनल मेडिकल कमीशन (National Medical Commission) और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (Indian Council of Medical Research) जैसे नियामक निकाय अपनी निगरानी बढ़ा रहे हैं। अब किसी भी ऐसी सुविधा पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है जो उचित नियामक अनुमति के बिना या स्वीकृत रिसर्च फ्रेमवर्क के बाहर इन थेरेपी को प्रदान करती पाई जाती है।

नियामक अनुपालन और रिसर्च की लागत

आगे बढ़ते हुए, इस क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों को अपना फोकस बदलना होगा। यदि वे इन थेरेपी का उपयोग जारी रखना चाहती हैं, तो उन्हें सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (Central Drugs Standard Control Organization) और इंस्टीट्यूशनल एथिक्स कमेटी (Institutional Ethics Committees) से रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल (Randomized Controlled Trials) के लिए मंजूरी लेनी होगी। इस प्रक्रिया में लागत बढ़ेगी और रेवेन्यू आने में लंबा समय लगेगा, क्योंकि रिसर्च ट्रायल कड़े नियमों के तहत होते हैं और इनमें नियमित क्लिनिकल बिक्री जैसी व्यावसायिक स्वतंत्रता नहीं मिलती है।

कंपनियों के लिए मुख्य जोखिम यह है कि वे उन मौजूदा रीजनरेटिव मेडिसिन सेवाओं से होने वाली आय खो सकती हैं जो नए, कड़े साक्ष्य मानकों को पूरा नहीं करती हैं। इसके अलावा, यदि कोई सुविधा अपडेटेड राष्ट्रीय दिशानिर्देशों का पालन किए बिना इन ट्रीटमेंट्स का विपणन जारी रखती है, तो प्रतिष्ठा को नुकसान या दंड का जोखिम भी है। भारत में रीजनरेटिव मेडिसिन मार्केट के बढ़ने का अनुमान लगाया गया था, लेकिन यह वृद्धि अब इंडस्ट्री की विश्वसनीय, विज्ञान-आधारित क्लिनिकल परिणाम प्रदान करने की क्षमता पर निर्भर करेगी। निवेशक यह देख सकते हैं कि प्राइवेट हेल्थकेयर प्रोवाइडर अपनी सेवाओं में कैसे समायोजन करते हैं। फोकस उन कंपनियों पर जाने की संभावना है जिनके पास पूरी तरह से अनुपालक, साक्ष्य-आधारित अनुसंधान कार्यक्रम हैं, बजाय उन पर जो बिनाproven उपचारों की बिक्री पर निर्भर हैं। मंत्रालय और ICMR से प्रवर्तन और अनुपालन ऑडिट के संबंध में लगातार अपडेट पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.