High-Alcohol Medicines अब Prescription पर! सरकार ने लगाया नया शिकंजा

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
High-Alcohol Medicines अब Prescription पर! सरकार ने लगाया नया शिकंजा

भारत सरकार ने 12% से ज़्यादा अल्कोहल वाली दवाओं को सख्त Schedule H1 कैटेगरी में डाल दिया है। इसका मतलब है कि अब इन दवाओं के लिए डॉक्टर का पर्चा (Prescription) ज़रूरी होगा और इनकी बिक्री का पूरा रिकॉर्ड रखना पड़ेगा। यह नियम जुलाई 2026 से लागू होगा और दवा कंपनियों के लाइसेंसिंग और फार्मेसी के नियमों पर सीधा असर डालेगा।

नई दवा नियम: क्या बदला?

जुलाई 2026 से, 12% से अधिक अल्कोहल वाली लिक्विड दवाओं (30 mL से बड़े कंटेनर में बिकने वाली) को कड़े Schedule H1 क्लासिफिकेशन में रखा गया है। पहले, इन दवाओं को Schedule K के तहत लाइसेंस की ज़रूरतों से छूट मिली हुई थी। लेकिन अब यह छूट खत्म हो गई है। इसका मतलब है कि दवा बनाने वाली कंपनियों को अब सरकारी लाइसेंस लेना होगा और फार्मेसी को भी ज़्यादा कड़े नियम मानने होंगे।

डॉक्टर की पर्ची और रिकॉर्ड रखना ज़रूरी

नए नियम के तहत, इन हाई-अल्कोहल दवाओं को केवल रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर (Registered Medical Practitioner) के प्रिस्क्रिप्शन पर ही दिया जा सकेगा। Schedule H1 क्लासिफिकेशन सिर्फ प्रिस्क्रिप्शन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि फार्मेसी को बिक्री का पूरा रजिस्टर मेंटेन करना होगा। इस रजिस्टर में डॉक्टर का नाम, पेशेंट की जानकारी, दवा का नाम और बेची गई मात्रा का पूरा विवरण होना चाहिए। फार्मेसी को यह रिकॉर्ड कम से कम तीन साल तक संभाल कर रखना होगा और ड्रग रेगुलेटर्स (Drug Regulators) कभी भी इसकी जांच कर सकते हैं।

क्यों उठाया गया ये कदम?

यह फैसला ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (Drugs Technical Advisory Board) और ड्रग्स कंसल्टेटिव कमेटी (Drugs Consultative Committee) की सिफारिशों के बाद लिया गया है। कई राज्यों की अथॉरिटीज ने इन दवाओं के गलत इस्तेमाल की चिंता जताई थी। कुछ दवाओं में 90% तक अल्कोहल होता है, इसलिए रेगुलेटर्स का मकसद इनके नशे के तौर पर इस्तेमाल को रोकना और लत लगने के खतरे को कम करना है। सरकार चाहती है कि इन दवाओं का इस्तेमाल सिर्फ सही मेडिकल ज़रूरतों के लिए ही हो।

कंपनियों के लिए क्या हैं मायने?

फार्मा सेक्टर की कंपनियों को अब अपने ऑपरेशन्स में बदलाव लाना होगा। मैन्युफैक्चरर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके प्रोडक्ट्स नई लाइसेंसिंग ज़रूरतों को पूरा करें। फार्मेसी के लिए, नए रिकॉर्ड-कीपिंग सिस्टम को लागू करना सबसे ज़रूरी होगा। ड्रग रूल्स, 1945 के तहत Schedule H1 नियमों का पालन न करने पर भारी जुर्माना, फार्मेसी लाइसेंस का सस्पेंशन या गंभीर मामलों में कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है। निवेशक इस बात पर नज़र रख सकते हैं कि हाई-अल्कोहल कैटेगरी की दवाएं बनाने वाली कंपनियां अपने डिस्ट्रीब्यूशन और लेबलिंग को इन नए नियमों के मुताबिक कैसे बदलती हैं।

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