सरकार ने सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि अस्पताल अपने सेवा शुल्क और सुविधाओं की जानकारी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करें। हालांकि यह कदम अभी सीधे प्राइस कैप (Price Cap) के बारे में नहीं है, लेकिन यह हॉस्पिटल सेक्टर पर बढ़ती सरकारी निगरानी का स्पष्ट संकेत है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक अहम निर्देश जारी किया है। इसके तहत 'क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट 2010' के तहत अस्पतालों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे अपने उपचार और परामर्श शुल्क को स्थानीय भाषाओं और अंग्रेजी में साफ तौर पर प्रदर्शित करें। इसका मुख्य उद्देश्य मरीजों को बिलिंग की अनिश्चितता से बचाना है।
राज्यों में कानूनी पेच
भारत में स्वास्थ्य एक राज्य का विषय है, इसलिए इसे लागू करने में चुनौतियां आ रही हैं। कर्नाटक सरकार का हालिया सर्कुलर, जिसमें दवाइयों के 'लैंडिंग प्राइस' और MRP को घोषित करना अनिवार्य किया गया था, कानूनी पचड़ों में फंस गया है। इस तरह के अलग-अलग नियम बड़ी हॉस्पिटल चेन्स के लिए काम करना मुश्किल बना रहे हैं क्योंकि उन्हें हर राज्य के हिसाब से अपनी ऑपरेशनल रणनीति बदलनी पड़ती है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
इन्वेस्टर्स के लिए चिंता की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही हॉस्पिटल फार्मेसी में दवाओं पर लिए जा रहे भारी मार्क-अप (Mark-up) पर सवाल उठा चुका है। कई निजी अस्पतालों के ऑपरेटिंग मार्जिन में इन फार्मेसी सेल्स का बड़ा योगदान होता है।
आगे चलकर 'नेशनल मेडिकल प्राइसिंग एंड रेगुलेशन कमीशन बिल 2026' जैसे प्रस्ताव यह दिखाते हैं कि सरकार मेडिकल खर्चों पर गहरी नजर रखने की तैयारी कर रही है। हालांकि अभी सीधे प्राइस कंट्रोल नहीं है, लेकिन भविष्य में ये पारदर्शिता नियम सख्त प्राइस-कंट्रोल मैकेनिज्म में बदल सकते हैं, जो हॉस्पिटल सेक्टर के फाइनेंशियल स्ट्रक्चर को लंबे समय में प्रभावित कर सकते हैं।
