केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने Schedule H, H1 और X की दवाओं के विज्ञापनों के लिए प्री-क्लियरेंस अनिवार्य करने का प्रस्ताव दिया है। इसका उद्देश्य मधुमेह और बीपी जैसी बीमारियों की दवाओं की आक्रामक मार्केटिंग पर लगाम लगाना है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय अब दवा कंपनियों के विज्ञापन के तरीकों पर नकेल कसने की तैयारी में है। सरकार के नए ड्राफ्ट प्रस्ताव के अनुसार, कंपनियों को अब किसी भी प्रिस्क्रिप्शन-ओनली दवा का विज्ञापन करने से पहले आधिकारिक मंजूरी लेनी होगी। यह नियम खास तौर पर Schedule H, H1 और X के तहत आने वाली दवाओं पर लागू होगा, जिनमें डायबिटीज और हाइपरटेंशन जैसी क्रॉनिक बीमारियों की दवाएं शामिल हैं।
आक्रामक मार्केटिंग पर लगाम
वर्तमान नियमों के तहत, इन श्रेणियों की दवाओं को बेचने के लिए पहले से ही डॉक्टर की पर्ची अनिवार्य है। सरकार का मकसद इन दवाओं के अंधाधुंध प्रमोशन को रोकना है ताकि जनता में इनका गलत इस्तेमाल न हो और दवाओं की अनावश्यक मांग न बढ़े। यह कदम क्लिनिकल सेफ्टी स्टैंडर्ड्स को बेहतर बनाने की दिशा में उठाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट ने भी फार्मा सेक्टर में अनैतिक मार्केटिंग प्रथाओं को लेकर सख्त निर्देश दिए हैं। 8 अक्टूबर 2026 को अदालत ने सरकार को 2 सप्ताह के भीतर एक एक्सपर्ट कमिटी बनाने का आदेश दिया है। यह कमिटी दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन और ब्रांड अवेयरनेस को प्रभावित करने के तरीकों की जांच करेगी।
निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?
फार्मा कंपनियों के लिए यह दौर रेगुलेटरी कंप्लायंस (Regulatory Compliance) बढ़ाने का है। यदि ये नए नियम लागू होते हैं, तो कंपनियों को अपने डिजिटल और प्रिंट एडवर्टाइजिंग बजट में बदलाव करना पड़ सकता है। इन्वेस्टर के तौर पर, अब आपको यह देखना होगा कि ये नए नियम मार्केटिंग खर्च और कंपनी के ओवरऑल बिजनेस मॉडल को कैसे प्रभावित करते हैं। फिलहाल, सरकार ने इस प्रस्ताव पर फीडबैक के लिए 30 दिन का समय दिया है।
