भारत सरकार इंपोर्टेड दवाओं (Imported Medicines) के लिए शेल्फ-लाइफ (Shelf-Life) के नियमों में ढील देने पर विचार कर रही है। हेल्थ मिनिस्ट्री (Health Ministry) ने प्रस्ताव दिया है कि अब दवाओं को भारत में प्रवेश करते समय उनकी कुल शेल्फ-लाइफ का सिर्फ **60%** बाकी होने के बजाय, कम से कम **12 महीने** की शेल्फ-लाइफ बची होनी चाहिए। इस बदलाव से दवा आयातकों (Pharmaceutical Importers) की लागत कम हो सकती है और इन्वेंट्री मैनेजमेंट (Inventory Management) बेहतर हो सकता है।
क्या है नया प्रस्ताव?
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय (Union Health Ministry) ने एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है, जिसमें इंपोर्टेड दवाओं की शेल्फ-लाइफ की गणना के तरीके में बदलाव का प्रस्ताव है। मौजूदा नियम के तहत, भारत में आने वाली दवाओं की कुल शेल्फ-लाइफ का कम से कम 60% बाकी होना अनिवार्य है। लेकिन, प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, अब इंपोर्टेड दवाओं को एंट्री पॉइंट पर कम से कम 12 महीने की शेल्फ-लाइफ के साथ आना होगा।
यह प्रस्ताव 22 जून, 2026 को सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य इंपोर्ट प्रक्रिया को आसान बनाना और उन दवाओं को बर्बाद होने से बचाना है, जो सिर्फ प्रतिशत गणना के कारण ठीक होने के बावजूद फेंक दी जाती हैं।
निवेशकों के लिए क्यों है यह अहम?
उन फार्मा कंपनियों के लिए जो खास दवाएं (Specialized Drugs), ऑन्कोलॉजी प्रोडक्ट्स (Oncology Products) या अन्य दुर्लभ दवाएं इंपोर्ट करती हैं, इन्वेंट्री मैनेजमेंट एक बड़ी चुनौती है। सख्त शेल्फ-लाइफ कानूनों के कारण, गोदामों में पड़े रहने या ट्रांजिट के दौरान दवाएं एक्सपायर हो जाती हैं, जिससे कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
12 महीने के फ्लैट रूल पर आने से कंपनियों की सप्लाई चेन (Supply Chain) को अधिक लचीलापन मिलेगा। अगर यह बदलाव लागू होता है, तो भारतीय बाजार में उच्च-मूल्य (High-Value) या आवश्यक दवाएं बेचने वाली कंपनियों के लिए इन्वेंट्री कंट्रोल बेहतर होगा और ऑपरेशनल कॉस्ट (Operational Cost) कम हो सकती है। घरेलू मैन्युफैक्चरिंग पर केंद्रित कंपनियों के लिए यह बड़ा बदलाव नहीं है, लेकिन इंपोर्ट पर अधिक निर्भर कंपनियों के लिए यह एक सकारात्मक कदम है।
बायोलॉजिकल प्रोडक्ट्स पर क्या असर?
यह प्रस्ताव सभी दवाओं पर लागू नहीं होगा। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि बायोलॉजिकल प्रोडक्ट्स (Biological Products) और रेडियोफार्मास्युटिकल्स (Radiopharmaceuticals) जैसी विशेष श्रेणियों के लिए मौजूदा कड़े नियम, यानी 60% से अधिक शेल्फ-लाइफ की आवश्यकता, जारी रहेगी। ये उत्पाद तापमान और समय के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, इसलिए इनकी क्वालिटी और सुरक्षा मानक सर्वोपरि हैं।
रेगुलेटरी हकीकत
फिलहाल यह सिर्फ एक प्रस्ताव है और कानून में तत्काल बदलाव नहीं है। मंत्रालय ने पुष्टि की है कि यह बदलाव केवल शेल्फ-लाइफ की आवश्यकताओं से संबंधित है और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत गुणवत्ता, प्रभावकारिता या सुरक्षा मानकों को नहीं बदलता है। इसका वास्तविक प्रभाव केवल अंतिम नोटिफिकेशन जारी होने और लागू होने के बाद ही पता चलेगा।
आगे क्या देखें?
निवेशकों को कुछ बातों पर नज़र रखनी चाहिए। पहला, अंतिम नोटिफिकेशन की समय-सीमा और क्या सरकार परामर्श अवधि के दौरान मिले इंडस्ट्री फीडबैक पर ध्यान देगी। दूसरा, जिन फार्मा कंपनियों का इंपोर्ट बिजनेस बड़ा है, वे अपने आगामी तिमाही नतीजों (Quarterly Results) में मैनेजमेंट की कमेंट्री पर ध्यान दें। एग्जीक्यूटिव्स (Executives) यह स्पष्ट कर सकते हैं कि यह बदलाव उनके इन्वेंट्री राइट-ऑफ (Inventory Write-offs) या प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margins) को कैसे प्रभावित करेगा।
