कैबिनेट सचिवालय के आदेश पर यूनियन हेल्थ मिनिस्ट्री ने भारतीय कोरोनरी स्टेंट्स की सुरक्षा को लेकर जांच शुरू कर दी है। यह कदम श्रीलंका में डिवाइस फेलियर की रिपोर्ट्स के बाद उठाया गया है, जिससे मेडिकल डिवाइस सेक्टर में कड़े नियम लागू हो सकते हैं।
जांच का दायरा और कारण
यूनियन हेल्थ मिनिस्ट्री ने 5 अक्टूबर को जारी एक सरकारी आदेश के बाद भारत में बने कोरोनरी स्टेंट्स की क्वालिटी की जांच शुरू की है। यह कार्रवाई श्रीलंका के बाजार से कुछ ड्रग-एल्यूटिंग स्टेंट्स (drug-eluting stents) को वापस मंगाए जाने के बाद हुई है। जांच में मुख्य रूप से हार्ट प्रोसीजर के दौरान स्टेंट के सही से न खुलने और डिवाइस के अपनी जगह से खिसकने जैसी गंभीर समस्याओं पर फोकस किया जा रहा है।
मेडिकल डिवाइस सेक्टर पर रेगुलेटरी दबाव
यह जांच भारत में कार्डियक मेडिकल डिवाइस के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को और मजबूत करने की सरकार की कोशिशों का हिस्सा है। पिछले कुछ वर्षों से Central Drugs Standard Control Organisation (CDSCO), 'Medical Devices Rules, 2017' के तहत नियमों को और सख्त बना रहा है। अब सभी इम्प्लांटेबल डिवाइस के लिए क्लिनिकल डॉक्यूमेंटेशन और सेफ्टी डेटा कलेक्शन को अनिवार्य बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
मैन्युफैक्चरिंग और कम्प्लायंस पर असर
सरकार अब स्टेंट्स के लिए अनिवार्य बैच और सीरियल-नंबर ट्रैकिंग लागू करना चाहती है, जिससे किसी भी खराबी का पता जल्दी लगाया जा सके। हालांकि यह मरीजों की सुरक्षा के लिए जरूरी है, लेकिन इससे मैन्युफैक्चरर्स के लिए ऑपरेशनल जरूरतें और कम्प्लायंस कॉस्ट बढ़ सकती है। कंपनियों को अपने प्रोडक्शन लाइन्स को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप अपग्रेड करना होगा।
निवेशकों के लिए अहम संकेत
मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए यह जानना जरूरी है कि क्या सरकार आगे चलकर पोस्ट-मार्केट सर्विलांस और बैच-टेस्टिंग के और सख्त नियम लाती है। यदि जांच के बाद कंपनियों को अपने प्रोडक्ट डिजाइन या मैन्युफैक्चरिंग प्रोटोकॉल में बदलाव करने पड़ते हैं, तो इसका सीधा असर भविष्य के रेवेन्यू और मार्जिन पर पड़ सकता है। सरकार अब अंतरराष्ट्रीय सेफ्टी अलर्ट्स को भारत के घरेलू मॉनिटरिंग सिस्टम से जोड़ने की योजना पर भी काम कर रही है, जिससे भविष्य में सख्ती और बढ़ेगी।
