भारतीय दवा कंपनियों के लिए बड़ी राहत की खबर है। सरकार ने ड्रग इम्पोर्ट लाइसेंस की प्रोसेसिंग टाइम को **90 दिन** से घटाकर **45 दिन** करने का प्रस्ताव रखा है। इसके साथ ही जेनेरिक दवाओं के लिए अप्रूवल प्रोसेस को भी आसान बनाया जा रहा है ताकि रिसर्च और डेवलपमेंट की रफ्तार बढ़ सके।
भारत सरकार दवा उद्योग में नियमों को आसान बनाकर जेनेरिक दवाओं के विकास और अप्रूवल को तेज करना चाहती है। ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड इस महीने इन बदलावों पर चर्चा करने वाला है, जो मुख्य रूप से इम्पोर्ट लाइसेंस के समय को घटाने और स्टडी प्रोसेस को सरल बनाने पर केंद्रित है।
क्या बदलेगा नियमों में?
फिलहाल फार्मा कंपनियों को जेनेरिक दवाओं की टेस्टिंग शुरू करने के लिए लंबे समय तक सरकारी मंजूरी का इंतजार करना पड़ता है। नए प्रस्ताव के तहत, कंपनियों को अब औपचारिक परमिशन के बजाय सिर्फ रेगुलेटर को सूचना देने (prior-intimation) की जरूरत होगी। इससे एडमिनिस्ट्रेटिव देरी कम होगी और कंपनियों का कीमती समय बचेगा।
इम्पोर्ट लाइसेंस में तेजी
सरकार Form CT-17 के तहत इम्पोर्ट लाइसेंस की समय सीमा को 90 वर्किंग डेज से घटाकर 45 वर्किंग डेज करने पर विचार कर रही है। ये लाइसेंस नई दवाओं और टेस्टिंग के लिए जरूरी प्रोडक्ट्स को मंगाने के लिए अनिवार्य होते हैं। समय कम होने से कंपनियां अपनी डेवलपमेंट प्रोसेस को तेजी से आगे बढ़ा सकेंगी। ये बदलाव New Drugs and Clinical Trials Rules, 2019 की समीक्षा का हिस्सा हैं।
किसे मिलेगा फायदा, किसे नहीं?
जेनेरिक दवा निर्माताओं के लिए यह कदम गेम-चेंजर साबित हो सकता है। हालांकि, सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए हाई-रिस्क कैटेगरी को इससे बाहर रखा गया है। वैक्सीन, बायोलॉजिक्स, कैंसर की दवाएं, नारकोटिक्स और साइकोट्रोपिक जैसी संवेदनशील कैटेगरी के लिए पुराने सख्त नियम ही लागू रहेंगे। निवेशकों की नजर अब बोर्ड की अंतिम बैठक और सरकार द्वारा जारी होने वाली गाइडलाइंस पर टिकी है।
