सरकार सभी प्रकार की स्टेराइल दवाओं के लाइसेंसिंग को 'सेंट्रल लाइसेंस अप्रूविंग अथॉरिटी' (CLAA) के तहत लाने की योजना बना रही है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद गुणवत्ता सुधारने के लिए यह बड़ा कदम उठाया गया है।
केंद्र सरकार स्टेराइल ड्रग्स के पूरे रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को बदलने की तैयारी में है। इस बड़े बदलाव का मकसद देश भर में सेफ्टी और माइक्रोबियल कंट्रोल के लिए एक समान मानक तैयार करना है। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें CDSCO इंस्पेक्टरों की शक्तियों पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए थे।
क्या है मौजूदा स्थिति?
अभी दवाओं का रेगुलेशन राज्य और केंद्र के बीच बंटा हुआ है। हालांकि वैक्सीन और लार्ज-वॉल्यूम पैरेंट्रल जैसी कैटेगरी पहले से ही CLAA की निगरानी में हैं, लेकिन कई इंजेक्टेबल और आंखों में डालने वाली दवाएं अभी भी राज्य के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। इस बिखरी हुई व्यवस्था के कारण क्वालिटी को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं, विशेषकर जब 2025-26 फाइनेंशियल ईयर के दौरान लगभग 240 इंजेक्शन सैंपल 'नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी' (NSQ) पाए गए।
फार्मा कंपनियों पर क्या होगा असर?
यह प्रस्तावित बदलाव फार्मा सेक्टर के लिए काफी अहम है। केंद्रीकृत लाइसेंसिंग का मतलब है कि कंपनियों को अब सख्त कंप्लायंस और अधिक डॉक्यूमेंटेशन से गुजरना होगा। हालांकि इससे लंबे समय में दवाओं की क्वालिटी और इंडस्ट्री की साख बेहतर होगी, लेकिन छोटी कंपनियों को अपने प्लांट को अपग्रेड करने में भारी खर्च करना पड़ सकता है।
निवेशकों के लिए संकेत
इस संक्रमण काल (Transition Phase) के दौरान निवेशकों को सतर्क रहना चाहिए। सरकार ने इसकी व्यवहार्यता जांचने के लिए 'ड्रग्स कंसल्टेटिव कमेटी' के तहत एक सब-कमेटी का गठन किया है। प्रक्रिया के दौरान नए प्रोडक्ट अप्रूवल या लाइसेंस रिन्यूअल में देरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, इसलिए मार्केट की नजर इस पर बनी रहेगी कि नए नियम कितनी स्पष्टता के साथ लागू किए जाते हैं।
