भारत अब बीमारियों के इलाज से ज्यादा रोकथाम यानी 'प्रिवेंटिव हेल्थकेयर' पर जोर दे रहा है। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन का इस्तेमाल कर सरकार हेल्थ खर्च को कैपिटल इन्वेस्टमेंट में बदलने की तैयारी में है, जिसका असर डायग्नोस्टिक्स और हेल्थ-टेक कंपनियों पर पड़ेगा।
चुनौती और नया दृष्टिकोण
भारत का 2047 तक डेवलप्ड इकोनॉमी बनने का सपना डायबिटीज और हाइपरटेंशन जैसी बीमारियों के कारण संकट में पड़ सकता है। ICMR-INDIAB के डेटा के मुताबिक, भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज के शिकार हैं। अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो इससे होने वाला आर्थिक नुकसान ट्रिलियन डॉलर्स में हो सकता है। इसे रोकने के लिए अब सरकार AI-इंटीग्रेटेड प्रिवेंटिव केयर मॉडल पर दांव लगा रही है।
कैसे काम करेगा यह सिस्टम?
Ayushman Bharat Digital Mission के जरिए अब तक 94 करोड़ से ज्यादा ABHA हेल्थ आईडी बनाई जा चुकी हैं। जिस तरह CoWIN प्लेटफॉर्म ने वैक्सीनेशन के लिए डेटा का इस्तेमाल किया, अब इसी तरह AI के जरिए मरीजों के ब्लड शुगर और अन्य टेस्ट के ट्रेंड्स को ट्रैक करके अर्ली क्लीनिकल अलर्ट्स दिए जाएंगे।
'कैपिटल एक्सपेंडिचर' का नया मंत्र
सरकार अब हेल्थ सेक्टर में होने वाले खर्च को केवल ऑपरेशनल कॉस्ट नहीं, बल्कि 'कैपिटल एक्सपेंडिचर' के तौर पर देख रही है। इस बदलाव से हेल्थ-टेक और डायग्नोस्टिक नेटवर्क में बड़े पैमाने पर निवेश आने की उम्मीद है, क्योंकि एक स्वस्थ वर्कफोर्स को लंबे समय के लिए एक इकोनॉमिक एसेट के रूप में देखा जा रहा है।
निवेशकों के लिए संकेत
यह बदलाव Dr Lal PathLabs, Metropolis Healthcare और Apollo Hospitals जैसे खिलाड़ियों के लिए गेम चेंजर हो सकता है। हालांकि, Digital Personal Data Protection Act का पालन करना एक बड़ी जिम्मेदारी होगी। डेटा सिक्योरिटी में किसी भी प्रकार की चूक सीधे कंपनियों के वैल्यूएशन पर असर डाल सकती है। आने वाले बजट और Ministry of Health के नए दिशा-निर्देश ही यह तय करेंगे कि निजी कंपनियां आयुष्मान भारत के इस डिजिटल ढांचे के साथ कितनी तेजी से जुड़ पाती हैं।
