भारत का 'नेशनल सिकल सेल एनीमिया एलिमिनेशन मिशन' अब बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग से आगे बढ़कर स्थाई 'वेलनेस हब' बनाने पर केंद्रित हो गया है। अब तक **7.27 करोड़** से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग हो चुकी है और अब सरकार का पूरा ध्यान मरीजों को आजीवन बेहतर इलाज मुहैया कराने पर है।
भारत सरकार का 'नेशनल सिकल सेल एनीमिया एलिमिनेशन मिशन' एक नए और महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है। अगस्त 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, सरकार ने 7.27 करोड़ नागरिकों की जांच पूरी कर ली है और लगभग 2.5 लाख सक्रिय मरीज (Active Cases) चिन्हित किए गए हैं। अब मिशन का अगला चरण इन मरीजों के लिए स्थाई और निरंतर इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित करना है।
गांव-गांव पहुंचेगी मेडिकल सुविधाएं
मिशन के नए फेज में राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे अधिक प्रभावित राज्यों में विशेष 'सिकल सेल वेलनेस हब' शुरू किए जा रहे हैं। इन केंद्रों का मुख्य उद्देश्य इलाज को बड़े शहरों के अस्पतालों से निकालकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों तक पहुंचाना है। सरकार अपने मौजूदा इन्फ्रास्ट्रक्चर, जैसे 'आयुष्मान आरोग्य मंदिर' को अपग्रेड कर रही है ताकि मरीजों को ब्लड ट्रांसफ्यूजन जैसी सुविधाएं आसानी से मिल सकें।
प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी
इस बड़े अभियान को सफल बनाने के लिए सरकार निजी क्षेत्र के साथ मिलकर काम कर रही है। 'नोवो नॉर्डिक एजुकेशन फाउंडेशन' (Novo Nordisk Education Foundation) जैसी संस्थाएं फ्रंटलाइन वर्कर्स को ट्रेनिंग देने और क्लिनिकल प्रोटोकॉल को स्टैंडर्डाइज करने में मदद कर रही हैं। इससे वैश्विक स्तर की बेस्ट प्रैक्टिसेज को भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली में लाने में मदद मिलेगी।
चुनौतियां और भविष्य की राह
हालांकि, यह बदलाव कई बड़ी चुनौतियों के साथ आया है। सुदूर इलाकों में हाइड्रोक्सीयूरिया (Hydroxyurea) जैसी दवाओं की सप्लाई चेन को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। साथ ही, इन वेलनेस हब की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे लंबे समय तक फंडिंग और फॉलो-अप केयर को कैसे मैनेज करते हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र के निवेशकों और स्टेकहोल्डर्स की नजर अब इस बात पर टिकी है कि सरकार इन मॉडल्स को बिना मानकों के समझौता किए कैसे स्केल करती है।
