भारत में दवा सप्लाई चेन को और मजबूत बनाने के लिए QR कोड का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है। लेकिन GS1 इंडिया के CEO एस. स्वामीनाथन का कहना है कि सिर्फ कोड लगाना काफी नहीं है, बल्कि डेटा को एक जैसा (यूनिफॉर्म) बनाना बहुत जरूरी है। सरकार **2027-28** तक ज़रूरी दवाओं के लिए QR कोड अनिवार्य कर रही है, पर स्टैंडर्ड्स की कमी से डेटा में गैप आ रहा है।
क्या है पूरा मामला?
भारत में फार्मा प्रोडक्ट्स पर QR कोड लगाने की पहल अब अहम मोड़ पर है। लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि सिर्फ बॉक्स पर कोड चिपकाना काफी नहीं होगा। GS1 इंडिया के CEO, एस. स्वामीनाथन ने इस बात पर जोर दिया है कि डेटा को इस तरह से स्टैंडर्डाइज करना होगा कि वह पूरी हेल्थकेयर सप्लाई चेन में आसानी से पढ़ा जा सके और इस्तेमाल हो सके।
सरकार ने 2027-28 तक वैक्सीन, कैंसर की दवाएं और नशीली दवाओं जैसी खास कैटेगरीज में QR कोड को अनिवार्य कर दिया है। इसका मकसद दवाओं की मूवमेंट को ट्रैक करना और उनकी असलियत की पहचान करना आसान बनाना है। लेकिन, स्वामीनाथन के मुताबिक, जब तक डेटा को प्रेजेंट करने का कोई एक स्टैंडर्ड तरीका नहीं होगा, तब तक यह सिस्टम बिखरा रहेगा। उन्होंने कहा कि भारत का ट्रैक-एंड-ट्रेस सिस्टम अभी काफी डेवलपमेंट मांगता है। एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियां अक्सर ग्लोबल नॉर्म्स फॉलो करती हैं, लेकिन डोमेस्टिक मार्केट में अभी भी एक यूनिफाइड स्ट्रक्चर की कमी है।
फार्मा कंपनियों पर असर
फार्मा सेक्टर पर नजर रखने वाले इन्वेस्टर्स के लिए, डेटा स्टैंडर्डाइजेशन की यह मांग कंपनियों के ऑपरेशन पर सीधा असर डालेगी। बड़ी मैन्युफैक्चरिंग वाली फार्मा कंपनियों को यह पक्का करना होगा कि उनकी पैकेजिंग और डिजिटल सिस्टम ऐसे कोड्स जेनरेट करें जो आपस में इंटरऑपरेबल हों। इसका मतलब है कि एक मैन्युफैक्चरर का बारकोड, डिस्ट्रीब्यूटर, वेयरहाउस सिस्टम और लोकल केमिस्ट बिना किसी गलती के पढ़ सकें।
इस जरूरत के चलते कई फार्मा कंपनियों को अपने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और पैकेजिंग लाइन अपग्रेड में लगातार खर्च करना पड़ सकता है। जिन कंपनियों ने पहले से ही एडवांस्ड सीरियलाइजेशन सिस्टम में निवेश किया है, उन्हें फायदा मिल सकता है, जबकि छोटी कंपनियों को इन नए डेटा नियमों का पालन करने में ज्यादा लागत लग सकती है। इसका लक्ष्य अलग-थलग पड़े 'डेटा साइलो' से हटकर एक कनेक्टेड नेटवर्क बनाना है, जिससे फैक्ट्री से लेकर मरीज तक पूरी विजिबिलिटी मिले।
इम्प्लीमेंटेशन के रिस्क और हकीकत
नकली दवाओं से लड़ने में QR कोड एक अहम टूल है, लेकिन यह कोई पूरा समाधान नहीं है। इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा रिस्क यह है कि सिर्फ इन कोड्स पर निर्भर रहने से हाई-टेक नकली दवा बेचने वाले नहीं रुकेंगे। सिस्टम की असरदारता इस बात पर निर्भर करती है कि कोड के पीछे का डिजिटल डेटा कितनी सुरक्षित तरीके से मैनेज किया जाता है।
इसके अलावा, इम्प्लीमेंटेशन में गैप का भी रिस्क है। अगर स्टैंडर्डाइजेशन की प्रक्रिया धीमी या असंगत रही, तो इंडस्ट्री को एक ऐसा सिस्टम मिल सकता है जो झूठी सुरक्षा का एहसास कराए। छोटे और मध्यम दर्जे के मैन्युफैक्चरर्स को ग्लोबल लेवल के डेटा स्टैंडर्ड्स अपनाने में शुरुआती सेटअप कॉस्ट से जूझना पड़ सकता है। इन स्टैंडर्ड्स को अपनाने में कोई भी देरी या अड़चन प्रोडक्ट रिकॉल की प्रक्रिया को भी जटिल बना सकती है, क्योंकि जब तक डेटा को सप्लाई चेन में किसी भी पॉइंट पर तेजी से एक्सेस और समझा न जा सके, तब तक ट्रेसिबिलिटी का कोई मतलब नहीं रह जाता।
आगे चलकर, सरकार फाइनल टेक्निकल स्टैंडर्ड्स कैसे डिफाइन करती है और फार्मा इंडस्ट्री को ट्रांजीशन के लिए पर्याप्त समय और सपोर्ट मिलता है या नहीं, यह देखना होगा। यह भी अहम होगा कि कंपनियां इन रिक्वायरमेंट्स को अपने मौजूदा सप्लाई चेन में बिना किसी बड़े मार्जिन डिसरप्शन के कितनी आसानी से इंटीग्रेट कर पाती हैं।
