NPPA का अहम फैसला: दवा कीमतों में सिर्फ **0.64%** की मामूली बढ़ोतरी, लागत से परेशान कंपनियां

HEALTHCAREBIOTECH
Whalesbook Logo
AuthorAditi Chauhan|Published at:
NPPA का अहम फैसला: दवा कीमतों में सिर्फ **0.64%** की मामूली बढ़ोतरी, लागत से परेशान कंपनियां
Overview

भारत की नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने एसेंशियल दवाओं (scheduled medicines) की मैक्सिमम रिटेल प्राइस (MRP) में **0.64%** की बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है। यह फैसला मार्च **2026** से लागू होगा। हालांकि, होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) में **0.64956%** की वृद्धि के आधार पर मिली यह मामूली राहत, बढ़ती इनपुट लागतों से जूझ रहे दवा निर्माताओं के लिए नाकाफी साबित हो रही है।

NPPA का फैसला और इंडस्ट्री की चिंता

नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने 'ड्रग्स (प्राइसेज कंट्रोल) ऑर्डर, 2013' के तहत एसेंशियल दवाओं की मैक्सिमम रिटेल प्राइस (MRP) में 0.64% की बढ़ोतरी की अनुमति दी है। यह इजाफा 2025 के होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) पर आधारित है, जो 0.64956% रहा। इस फैसले से नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM) में शामिल करीब 900 दवाएं, जैसे दर्द निवारक और एंटीबायोटिक्स, की कीमतों में बढ़ोतरी संभव होगी। बता दें कि इससे पहले 2024 में 1.74% और 2023 में मात्र 0.0055% की बढ़ोतरी हुई थी।

लागतों का भारी बोझ, राहत नाकाफी

हालांकि, यह 0.64% की बढ़ोतरी फार्मा कंपनियों के लिए पर्याप्त राहत नहीं है। एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स (API), सॉल्वैंट्स और पैकेजिंग मटेरियल की लागतों में पिछले कुछ समय में 200% से 300% तक का भारी इजाफा हुआ है। वैश्विक सप्लाई चेन में आई दिक्कतें, खासकर चीन से होने वाले एपीआई इम्पोर्ट में रुकावटें, इसकी मुख्य वजह बताई जा रही हैं। इस कारण कुछ महत्वपूर्ण कच्चे माल, जैसे पैरासिटामोल API, की कीमतें दोगुनी हो गई हैं, जिसने कई निर्माताओं को प्रोडक्शन रोकने पर मजबूर कर दिया है।

इंडस्ट्री का आकार और चुनौतियां

भारत का फार्मा सेक्टर, जो 2023-24 में लगभग $50 बिलियन का था और 2030 तक $130 बिलियन तक पहुंचने का लक्ष्य रखता है, वर्तमान में कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। Nifty Pharma इंडेक्स का P/E रेश्यो 33.9 के स्तर पर है, जो इंडस्ट्री पर बाजार के दबाव को दर्शाता है। विश्लेषकों का अनुमान है कि 2026 में ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन 24-25% के आसपास बने रहेंगे, लेकिन यह बढ़ती लागतों के कारण प्रभावित हो सकता है। घरेलू बाजार में 8-10% की ग्रोथ की उम्मीद है, पर अमेरिकी जैसे प्रमुख एक्सपोर्ट बाजारों में यह धीमी हो सकती है।

रेगुलेटरी दबाव और इम्पोर्ट पर निर्भरता

लगातार बढ़ती इनपुट लागत और कीमतों पर सरकारी नियंत्रण के बीच, कई कंपनियां नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं या एक्सपोर्ट पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रही हैं। हालांकि, एक्सपोर्ट के मामले में भी US FDA जैसी अंतरराष्ट्रीय नियामकों की कड़ी निगरानी और ग्लोबल प्राइसिंग का दबाव बना रहता है। API के लिए चीन पर इंडस्ट्री की भारी निर्भरता इसे ग्लोबल सप्लाई चेन में किसी भी तरह की गड़बड़ी या लागत वृद्धि के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है। इसके अलावा, संसद की एक समिति ने NPPA की निगरानी को और मजबूत करने की सलाह दी है, जिससे भविष्य में कीमतों को लेकर और अधिक रेगुलेटरी दखलअंदाजी बढ़ सकती है।

भविष्य का दृष्टिकोण

2026 के लिए, एनालिस्ट्स भारतीय फार्मा सेक्टर में 7-9% की रेवेन्यू ग्रोथ का अनुमान लगा रहे हैं, जो डोमेस्टिक सेल्स और यूरोप में एक्सपोर्ट से प्रेरित होगी। ऑपरेटिंग मार्जिन 24-25% पर स्थिर रहने की उम्मीद है। हालांकि, यह अनुमान ऊंचे इन्फ्लेशन रेट और जटिल ग्लोबल रेगुलेशंस से प्रभावी ढंग से निपटने पर निर्भर करेगा। सेक्टर की भविष्य की ग्रोथ क्वालिटी, इनोवेशन में सुधार के साथ-साथ डोमेस्टिक प्राइस कंट्रोल्स का पालन करने पर टिकी रहेगी। यह संतुलन उन कंपनियों के लिए फायदेमंद होगा जिनके पास आय के विविध स्रोत हैं या जो NLEM में सूचीबद्ध नहीं उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करती हैं।

Disclaimer:This content is for informational purposes only and does not constitute financial or investment advice. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making decisions. Investments are subject to market risks, and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors are not liable for any losses. Accuracy and completeness are not guaranteed, and views expressed may not reflect the publication’s editorial stance.