सप्लाई चेन पर मंडराता खतरा
भारत का फार्मा सेक्टर, खासकर पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच, पेट्रोकेमिकल इनपुट्स की लगातार सप्लाई सुनिश्चित करने को अपनी टॉप प्रॉयोरिटी बता रहा है। सरकार द्वारा 30 जून तक 40 से ज़्यादा ज़रूरी प्रोडक्ट्स पर कस्टम ड्यूटी में अस्थायी छूट देने से लागत कम करने में मदद तो मिली है, लेकिन इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ी दिक्कत इन ज़रूरी मटीरियल्स को फिजिकली हासिल करने और उन्हें समय पर ट्रांसपोर्ट करने की बनी हुई है।
भू-राजनीतिक चुनौतियां
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और लाल सागर (Red Sea) जैसे प्रमुख शिपिंग रूट्स में आई रुकावटों ने सप्लाई चेन को और ज़्यादा वल्नरेबल बना दिया है। सऊदी केमिकल कंपनी SABIC का मेथनॉल (Methanol) और स्टाइरीन (Styrene) पर 'फोर्स मेज्योर' घोषित करना इस स्थिति की गंभीरता को दिखाता है। कई जहाज़ अब केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) के चक्कर लगाकर लंबा रास्ता तय कर रहे हैं, जिससे डिलीवरी टाइम में हफ़्ते जुड़ गए हैं और मैन्युफैक्चरर्स जिन स्टॉक लेवल्स पर निर्भर करते हैं, उन पर दबाव बढ़ गया है।
सरकारी मदद और एक्सपोर्ट को बूस्ट
हाल ही में 30 जून तक एनहाइड्रस अमोनिया, मेथनॉल, स्टाइरीन और विभिन्न पॉलिमर्स जैसे आइटम्स पर दी गई ड्यूटी वेवर का मकसद बढ़ी हुई कीमतों के असर को कम करना है। फार्मास्युटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (Pharmexcil) जैसे इंडस्ट्री ग्रुप्स इस राहत का स्वागत तो करते हैं, लेकिन उनका कहना है कि इसका असली फायदा इन गुड्स की ग्लोबल कीमतों में स्थिरता पर निर्भर करेगा। इसी के साथ, RoDTEP स्कीम को भी पहले के स्तरों पर बहाल कर दिया गया है, जिससे भारतीय मेडिकल डिवाइस और फार्मा एक्सपोर्टर्स को दुनिया भर में बेहतर कॉम्पिटिशन करने में मदद मिलनी चाहिए।