मार्च में 5 साल की सबसे बड़ी गिरावट
आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2026 में भारत से दवाओं का निर्यात (Exports) घटकर $2.83 बिलियन रह गया, जबकि मार्च 2025 में यह $3.68 बिलियन था। इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि इस बड़ी गिरावट की 80-90% वजह लॉजिस्टिक्स की दिक्कतें हैं, न कि दवाओं की मांग में कमी।
सप्लाई चेन पर संकट, जरूरी दवाएं अटकीं
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने भारत की फार्मा सप्लाई चेन (Supply Chain) को बुरी तरह झकझोर दिया है। यूरोप, उत्तरी अमेरिका और अफ्रीका भेजे जाने वाले शिपमेंट्स के लिए दुबई, अबू धाबी और दोहा जैसे गल्फ ट्रांजिट हब (Transit Hubs) का इस्तेमाल होता है। ये इलाके तापमान-संवेदनशील दवाओं जैसे बायोलॉजिक्स (Biologics), कैंसर की दवाओं और वैक्सीन्स के लिए बेहद ज़रूरी कोल्ड-चेन ट्रांजिट पॉइंट (Cold-Chain Transit Points) हैं। लॉजिस्टिक्स में थोड़ी सी भी गड़बड़ी इन कीमती उत्पादों को खराब कर सकती है। इसके चलते शिपिंग कंपनियों ने प्रति शिपमेंट $3,500 से $8,000 तक का सरचार्ज (Surcharge) लगा दिया या गल्फ के लिए कार्गो लेने से मना कर दिया। चीन से ज़रूरी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (APIs) की कंटेनर शिपिंग लागत भी दोगुनी होकर $1,200 से $2,400 प्रति यूनिट हो गई।
भू-राजनीतिक जोखिम और लागत का दबाव
इंडस्ट्री एग्जीक्यूटिव्स का अनुमान है कि मार्च के महीने में इस एक्सपोर्ट्स में आई गिरावट का सीधा असर $300 मिलियन से $500 मिलियन तक हो सकता है। दुनिया की 'Pharmacy' कहे जाने वाले भारत के लिए यह गिरावट एक बड़ी चेतावनी है। रेड सी (Red Sea) और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे समुद्री रास्तों पर भारी निर्भरता, इसे भू-राजनीतिक अस्थिरता (Geopolitical Instability) के प्रति संवेदनशील बनाती है। इससे लागत बढ़ सकती है और डिलीवरी में देरी हो सकती है। साथ ही, भारत अपनी API जरूरतों का बड़ा हिस्सा चीन से आयात करता है, जिससे सप्लाई चेन पर निर्भरता बनी रहती है।
लॉन्ग-टर्म आउटलुक मजबूत
हालांकि, इस मार्च की गिरावट के बावजूद, भारतीय फार्मा सेक्टर का लॉन्ग-टर्म आउटलुक (Long-Term Outlook) काफी मजबूत बना हुआ है। पूरे फाइनेंशियल ईयर 2026 के लिए, कुल एक्सपोर्ट्स $31.11 बिलियन रहे, जो पिछले फाइनेंशियल ईयर के मुकाबले 2.13% की बढ़ोतरी दर्शाता है। इंडस्ट्री का अनुमान है कि 2030 तक यह सेक्टर बढ़कर $130 बिलियन तक पहुंच सकता है। सरकार की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम्स API में आत्मनिर्भरता और वैक्सीन निर्माण को बढ़ावा दे रही हैं। कंपनियां बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स (Biosimilars) जैसे हाई-वैल्यू सेगमेंट पर भी ध्यान केंद्रित कर रही हैं।