एक्सपोर्ट में तेजी जारी
भारतीय फार्मा सेक्टर का एक्सपोर्ट परफॉरमेंस लगातार मजबूत बना हुआ है। फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में देश के फार्मा एक्सपोर्ट्स 9.4% की जोरदार बढ़ोतरी के साथ $30.47 बिलियन पर पहुंच गए हैं। यह आंकड़ा ग्लोबल मार्केट में किफायती दवाओं (affordable medicines) के एक अहम सप्लायर के तौर पर भारत की पोजीशन को और मजबूत करता है। करीब $60 बिलियन के इस सेक्टर का लक्ष्य 2030 तक एक्सपोर्ट्स को $130 बिलियन तक ले जाने का है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा फार्मा प्रोड्यूसर है और इसके प्रोडक्ट्स 200 से अधिक देशों में जाते हैं। इन एक्सपोर्ट्स का एक बड़ा हिस्सा, यानी 60%, रेगुलेटेड मार्केट्स (जैसे अमेरिका और यूरोप) में जाता है, जो क्वालिटी और कंप्लायंस के प्रति ग्लोबल भरोसे को दर्शाता है।
ट्रेड डील्स से मिलेगी बड़ी रफ्तार
हाल ही में हुए द्विपक्षीय ट्रेड एग्रीमेंट्स (bilateral trade agreements) एक्सपोर्ट की गति को और बढ़ाने वाले हैं। यूरोपियन यूनियन (EU) के साथ हुआ समझौता, जिसका फार्मा और मेडिकल डिवाइस मार्केट $572.3 बिलियन का है, इंडियन कंपनियों के लिए मार्केट एक्सेस (market access) और रेगुलेटरी सहयोग को बेहतर बनाएगा। वहीं, अमेरिका के साथ हुए ट्रेड अरेंजमेंट से प्राइस कॉम्पिटिटिवनेस (price competitiveness) बढ़ेगी और मार्केट में एंट्री आसान होगी। यह भारतीय कंपनियों, खासकर जेनेरिक मेडिसिन सेगमेंट के लिए बहुत अहम है, जो अमेरिका को होने वाले कुल फार्मा एक्सपोर्ट्स का लगभग 35% है। इन डेवलपमेंट से इंडियन ड्रगमेकर्स को स्टेबिलिटी मिलेगी और वे दूसरे देशों के मुकाबले बेहतर पोजीशन में आएंगे। Sun Pharma, Dr. Reddy's Laboratories और Cipla जैसी प्रमुख भारतीय फार्मा कंपनियों ने इन ट्रेड अनाउंसमेंट्स के बाद पॉजिटिव सेंटीमेंट देखा है।
सेक्टर का गहरा विश्लेषण
भारतीय फार्मा इंडस्ट्री वर्ल्डवाइड जेनेरिक मेडिसिन सप्लाई में 20% की हिस्सेदारी रखती है और ग्लोबल वैक्सीन प्रोडक्शन में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है। इसकी ताकत कॉस्ट-इफेक्टिव मैन्युफैक्चरिंग, यूएस एफडीए (US FDA) अप्रूव्ड प्लांट्स की बड़ी संख्या और डायवर्सिफाइड प्रोडक्ट पोर्टफोलियो में है। कंपनियां अब API मैन्युफैक्चरिंग और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में भी ज्यादा निवेश कर रही हैं, जिससे सप्लाई चेन कंट्रोल और वैल्यू एडिशन बढ़ेगा।
कंपनियों की वैल्यूएशन (valuation) की बात करें तो, Sun Pharmaceutical Industries का प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेशियो लगभग 37-38 है, जो इंडस्ट्री एवरेज 26-32 से काफी ऊपर है। वहीं, Dr. Reddy's Laboratories का P/E रेशियो करीब 18-19 और Cipla का 23-24 है। EU-India फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से EU में फार्मा इम्पोर्ट्स पर टैरिफ 11% से घटकर लगभग जीरो हो जाएगा, जिससे कॉस्ट कॉम्पिटिटिवनेस सुधरेगी।
इन बातों का भी रखें ध्यान
हालांकि एक्सपोर्ट के आंकड़े और ट्रेड डील्स सकारात्मक हैं, लेकिन कुछ रिस्क भी मौजूद हैं। भारत का एक्सपोर्ट्स बड़े पैमाने पर अमेरिका मार्केट पर निर्भर है, जो कुल फार्मा शिपमेंट्स का लगभग 35% है। यह कंसंट्रेशन रिस्क (concentration risk) पैदा करता है। दूसरी ओर, US जेनेरिक मार्केट में बढ़ती कॉम्पिटिशन और प्राइस इरोजन (price erosion) Sun Pharma, Dr. Reddy's और Cipla जैसी कंपनियों के लिए चुनौतियां खड़ी कर सकता है। स्ट्रिंजेंट रेगुलेटरी मार्केट्स के लिए कंटीन्यूअस इन्वेस्टमेंट की जरूरत एक और चुनौती है, खासकर छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों के लिए। इसके अलावा, यूरोपियन मार्केट में इन्फ्लेशनरी प्रेशर और मैक्रोइकोनॉमिक अनिश्चितता डिमांड और प्रॉफिटेबिलिटी को प्रभावित कर सकती है। Sun Pharma का हाई P/E रेशियो यह भी दिखाता है कि अगर एक्सपोर्ट ग्रोथ धीमी हुई तो यह स्टॉक ज्यादा दबाव में आ सकता है। ऐसे में 2026-27 तक डबल-डिजिट एक्सपोर्ट ग्रोथ का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
भविष्य की राह
कॉमर्स मिनिस्ट्री ने एक्सपोर्टर्स और रेगुलेटर्स के साथ लगातार जुड़कर मुद्दों को हल करने और एक्सपोर्ट ग्रोथ को सपोर्ट करने का भरोसा जताया है। ₹10,000 करोड़ के बजट वाली 'Biopharma SHAKTI' इनिशिएटिव का लक्ष्य बायोलॉजिक्स (biologics) और बायोसिमिलर्स (biosimilars) में भारत की क्षमता को बढ़ाना है। सरकारी हस्तक्षेप और सेक्टर का हाई-वैल्यू सेगमेंट पर फोकस, भारत को ग्लोबल फार्मा हब बनाने में मदद करेगा। डोमेस्टिक मार्केट में भी 8.1% की ग्रोथ का अनुमान है।