लॉजिस्टिक्स की मार, निर्यात में आई बड़ी गिरावट
भारत के फार्मा निर्यात, जो ग्लोबल ट्रेड का एक अहम हिस्सा हैं, मार्च FY26 में 23.17% लुढ़क गए। मार्च 2025 में जहाँ यह $3.68 बिलियन था, वहीं मार्च 2026 में घटकर $2.83 बिलियन रह गया। यह लगातार तीन फाइनेंशियल इयर्स की ग्रोथ के बाद पहली मासिक गिरावट थी। हालाँकि, इस गिरावट के बावजूद, पूरे फाइनेंशियल ईयर FY26 के लिए कुल फार्मा निर्यात $31.11 बिलियन पर पहुँच गया, जो FY25 के $30.47 बिलियन की तुलना में 2.13% की मामूली वृद्धि दर्शाता है। इस गिरावट की मुख्य वजह वेस्ट एशिया में चल रहा संघर्ष रहा, जिसने दुबई और अबू धाबी जैसे प्रमुख ट्रांजिट हब से शिपिंग और एयर कार्गो को बुरी तरह प्रभावित किया।
क्षेत्रीय प्रदर्शन में दिखी मिली-जुली तस्वीर
जहां अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाजारों में सप्लाई चेन की दिक्कतें दिखीं, वहीं अफ्रीका में 13%, ओशनिया में 11.5%, और लैटिन अमेरिका व कैरेबियन में 10% की वृद्धि दर्ज की गई। यह मांग में भौगोलिक फैलाव को दर्शाता है। हालाँकि, यह भी माना जा रहा है कि ये उभरते बाज़ार कीमतों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हैं और शिपिंग में अस्थिरता जैसे बाहरी झटकों का शिकार हो सकते हैं। प्रोडक्ट्स की बात करें तो, ड्रग फॉर्मूलेशन और बायोलॉजिक्स (जो निर्यात का 74.2% हिस्सा हैं) ने फाइनेंशियल ईयर में 0.7% की मामूली वृद्धि दिखाई। वहीं, वैक्सीन्स (Vaccines) इस सेगमेंट में सबसे बेहतर रहे, जिनमें 26.4% की ज़बरदस्त बढ़त के साथ $1.5 बिलियन का निर्यात हुआ। दूसरी ओर, आयुष (Ayush) और हर्बल प्रोडक्ट्स में 7.3% की गिरावट देखी गई। खास तौर पर, बायोलॉजिक्स, कैंसर ड्रग्स और वैक्सीन्स जैसे टेम्परेचर-सेंसिटिव प्रोडक्ट्स, जिन्हें लगातार कोल्ड चेन की ज़रूरत होती है, मार्च की सप्लाई चेन गड़बड़ियों से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए।
मार्जिन और सप्लाई चेन पर मंडराता खतरा
हालिया लॉजिस्टिक्स की दिक्कतें सप्लाई चेन की कमजोरियों को उजागर करती हैं, खासकर खाड़ी क्षेत्र के ट्रांजिट हब पर भारत की निर्भरता। प्रति शिपमेंट $3,500 से $8,000 तक बढ़े फ्रेट कॉस्ट (Freight Cost) और लंबे ट्रांजिट समय ने सीधे तौर पर लागत बढ़ा दी है, जिससे भारतीय फार्मा एक्सपोर्टर्स के प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margin) पर दबाव आ सकता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा सप्लायर है, जो 200 से ज़्यादा देशों को निर्यात करता है। लेकिन, बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत उसकी प्राइस एडवांटेज (Price Advantage) को खतरे में डाल रही है। Nifty Pharma इंडेक्स अभी लगभग 34.83 के P/E रेश्यो पर ट्रेड कर रहा है, जो निवेशकों की ग्रोथ की उम्मीद को दिखाता है। लेकिन अगर मार्जिन प्रेशर कम नहीं होता है, तो सप्लाई चेन की अस्थिरता इन स्टॉक वैल्यूएशन्स को चुनौती दे सकती है। इसके अलावा, कुछ बल्क ड्रग्स के लिए चीन से APIs (Active Pharmaceutical Ingredients) की सोर्सिंग भी एक संभावित सप्लाई रिस्क बनी हुई है।
लंबी अवधि में ग्रोथ की उम्मीदें बरकरार
भू-राजनीतिक घटनाओं और लॉजिस्टिक्स की बाधाओं से उत्पन्न अल्पकालिक चुनौतियों के बावजूद, भारत के फार्मा एक्सपोर्ट्स का लॉन्ग-टर्म आउटलुक (Long-term outlook) मज़बूत बना हुआ है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि यह सेक्टर 2030 तक लगभग $130 बिलियन और 2047 तक $350 बिलियन तक पहुंच सकता है। यह उम्मीदें किफायती जेनेरिक्स, वैक्सीन्स और स्पेशियलिटी दवाओं की मजबूत ग्लोबल डिमांड, साथ ही भारत की स्थापित मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं और बढ़ते R&D निवेश से प्रेरित हैं। बायोलॉजिक्स और स्पेशियलिटी जेनेरिक्स जैसे हाई-वैल्यू वाले क्षेत्रों में सेक्टर का आगे बढ़ना और अमेरिका व यूरोप जैसे रेगुलेटेड मार्केट्स से लगातार मांग भी ग्रोथ के प्रमुख कारक हैं। 'Pharmacy of the World' के तौर पर भारत की भूमिका मजबूत होने की उम्मीद है, बशर्ते यह सेक्टर सप्लाई चेन की कमजोरियों को दूर कर सके और भू-राजनीतिक जोखिमों के असर को अपनी लागत पर कम कर सके।
