सुरक्षा निगरानी में तेजी का नया दौर
CDSCO का यह नया नियम दवाओं के अप्रूवल और उनके बाज़ार में आने के बीच के लंबे गैप को खत्म करने के मकसद से लाया गया है। पहले, दवा अप्रूव होने के बाद भी उसके बाज़ार में आने तक की कीमती रियल-वर्ल्ड सेफ्टी डेटा अक्सर इकट्ठा नहीं हो पाता था। अब, PSURs को मार्केट लॉन्च से ही शुरू करने का मतलब है कि मरीजों द्वारा दवा का इस्तेमाल शुरू करते ही उसकी सुरक्षा की निगरानी तेज हो जाएगी। यह बदलाव यूरोपियन मेडिसिन्स एजेंसी (EMA) जैसे ग्लोबल रेगुलेटर्स के मानकों के करीब लाता है, जिससे दवाओं के साइड इफेक्ट्स और रिस्क की पहचान शुरुआत से ही बेहतर तरीके से की जा सकेगी।
ग्लोबल स्टैंडर्ड्स और भारतीय फार्मा का दम
दुनिया भर में, PSURs दवाओं की सुरक्षा का मूल्यांकन करने का एक अहम हिस्सा हैं। यूरोपियन यूनियन में, अप्रूवल के बाद तय समय पर ये रिपोर्ट देनी होती हैं। अमेरिका में भी पोस्ट-मार्केट ट्रैकिंग और एडवर्स इवेंट रिपोर्टिंग अनिवार्य है। मार्केट लॉन्च को PSURs से जोड़ने के साथ, भारत ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के और करीब आ रहा है। 'दुनिया की फार्मेसी' के तौर पर जानी जाने वाली भारतीय फार्मा इंडस्ट्री पहले से ही एक जटिल रेगुलेटरी माहौल में काम कर रही है। PSURs के अलावा, कंपनियों को गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज (GMP), बायो-इक्विवेलेंस टेस्ट्स और ट्रेसेबिलिटी जैसे नए नियमों का भी पालन करना होता है, जिससे कंप्लायंस कॉस्ट बढ़ रही है। भारत का दवा बाज़ार वॉल्यूम के हिसाब से लगभग 65 अरब डॉलर का है और 2030 तक इसके 130 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। लगभग 70% एक्सपोर्ट सख्त बाज़ारों में होता है, जो इस ग्रोथ को बढ़ावा दे रहा है।
दवा कंपनियों के लिए नई चुनौतियाँ
हालांकि CDSCO का नियम मरीजों की सुरक्षा के लिए है, लेकिन दवा कंपनियों, खासकर छोटी कंपनियों के लिए यह ऑपरेशनल और फाइनेंशियल लागत बढ़ाएगा। मार्केट लॉन्च की तारीख से ही PSURs की डेडलाइन पूरी करने के लिए कंपनियों को एफिशिएंट इंटरनल प्रोसेस, मजबूत डेटा मैनेजमेंट और सुरक्षा निगरानी में शुरुआती निवेश की आवश्यकता होगी। गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज (GMP) के सख्त नियम और डिजिटल रिपोर्टिंग की बढ़ती मांग जैसे अन्य रेगुलेटरी बदलाव पहले से ही कंप्लायंस बजट पर दबाव डाल रहे हैं। जिन कंपनियों के पास मार्केट एंट्री के साथ तैयार फार्माकोविजिलेंस सिस्टम नहीं होंगे, उन्हें पेनाल्टी या अपने प्रोडक्ट्स को मैनेज करने में देरी का सामना करना पड़ सकता है। इससे नई दवाओं को बाज़ार में लाने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है, खासकर उन कंपनियों के लिए जिनकी सुरक्षा निगरानी प्रणाली कमजोर है।
नए नियमों के साथ तालमेल
भारत का बदलता रेगुलेटरी माहौल अधिक जवाबदेही और सक्रिय सुरक्षा निगरानी की मांग कर रहा है। अब दवा कंपनियों को PSUR प्लानिंग को केवल एक एडमिनिस्ट्रेटिव काम की तरह देखने के बजाय, अपनी प्री-लॉन्च स्ट्रेटेजी में शामिल करना होगा। इसके लिए रेगुलेटरी अफेयर्स, R&D और कमर्शियल डिपार्टमेंट्स के बीच बेहतर तालमेल की ज़रूरत होगी। जैसे-जैसे भारत एक प्रमुख ग्लोबल दवा सप्लायर बन रहा है, इन नियमों के साथ तेज़ी से तालमेल बिठाना सफलता के लिए महत्वपूर्ण होगा। जो कंपनियाँ इन उच्च मानकों को पूरा करने के लिए अपनी लॉन्च और सुरक्षा निगरानी प्रक्रियाओं को जल्दी से समायोजित कर सकेंगी, वे भारतीय बाज़ार में बेहतर स्थिति में होंगी और प्रतिस्पर्धी बनी रहेंगी।
