Union Budget 2026: फार्मा सेक्टर को बूस्ट, पर जेनरिक दवाएं अभी भी महंगी!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Union Budget 2026: फार्मा सेक्टर को बूस्ट, पर जेनरिक दवाएं अभी भी महंगी!
Overview

भारत के यूनियन बजट 2026 में फार्मा सेक्टर के लिए इनोवेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़े निवेश का ऐलान किया गया है। हालांकि, सरकारी लाख कोशिशों के बावजूद, सस्ती जेनरिक दवाइयों को आम लोगों तक पहुंचाने में बड़ी बाधाएं आ रही हैं।

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बजट का जोर, पर जेनरिक दवाएं क्यों नहीं पहुंच रहीं?

यूनियन बजट 2026 में इंडियन फार्मा इंडस्ट्री को मजबूत करने के लिए इनोवेशन (Innovation) और इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) में बड़े निवेश का प्लान तैयार किया गया है। इसका मकसद भारत की ग्लोबल पोजीशन को और बेहतर बनाना है। लेकिन, जहाँ सरकार सस्ती जेनरिक दवाओं से खर्च घटाने का सपना देख रही है, वहीं कई वजहें हैं जिनकी वजह से ये दवाएं आम लोगों तक नहीं पहुंच पा रही हैं। भारत का जेनरिक ड्रग मार्केट 2034 तक $53.5 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, लेकिन लोगों का हेल्थकेयर पर होने वाला खर्च अब भी काफी ज्यादा है।

बजट से फार्मा को बूस्ट, पर मार्केट में मिली-जुली प्रतिक्रिया

सरकार ने 'बायोफार्मा शक्ति' (Biopharma Shakti) इनिशिएटिव के तहत पांच सालों में ₹10,000 करोड़ का फंड आवंटित किया है। इसे बाजार में मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली है, हालांकि बजट घोषणाओं के बाद NIFTY Pharma Index में कुछ तेजी देखी गई, जो सरकार के कमिटमेंट पर निवेशकों का भरोसा दिखाती है। इस स्ट्रैटेजिक पुश का लक्ष्य भारत को बायोलॉजिक्स (Biologics) और बायोसिमिलर्स (Biosimilars) का ग्लोबल हब बनाना है, जिसमें फोकस हाई-वॉल्यूम वाले पारंपरिक जेनरिक से हटकर है। हालांकि, मई 2026 के लेटेस्ट मार्केट डेटा के मुताबिक, सेक्टर में अस्थिरता (volatility) देखी गई है। कुछ बड़े जेनरिक प्लेयर्स को बिक्री में नुकसान और प्राइसिंग प्रेशर का सामना करना पड़ रहा है, जो बताता है कि आर्थिक हालात और अलग-अलग दवाओं के लाइफसाइकल (lifecycle) पॉलिसी के ऑप्टिमिज्म (optimism) को कम कर सकते हैं। भारत का फार्मा एक्सपोर्ट (export) काफी बड़ा है, जिसमें जेनरिक दवाओं का रेवेन्यू (revenue) इंडस्ट्री का करीब 70% है और ये खासकर US और यूरोप जैसे रेगुलेटेड मार्केट (regulated markets) की बड़ी डिमांड पूरी करती है।

जेनरिक का मुश्किल: डोमेस्टिक मार्केट में ब्रांडेड दवाओं का राज

'दुनिया की फार्मेसी' के तौर पर मशहूर होने के बावजूद, भारत के डोमेस्टिक मार्केट में कुछ अंदरूनी समस्याएं हैं। प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) का लक्ष्य क्वालिटी वाली जेनरिक दवाएं 50-90% तक कम दाम पर उपलब्ध कराना है, जिससे सालाना करीब ₹5,000 करोड़ की बचत होने का अनुमान है। लेकिन, इसकी पहुंच सीमित है। कुछ प्रमुख समस्याएं हैं - जनऔषधि केंद्रों (Jan Aushadhi Kendras) की कमी, दवाओं की सीमित वैरायटी (variety), और उपलब्धता में अनिश्चितता। इससे भी बड़ी बात यह है कि मार्केट में 'ब्रांडेड जेनरिक' का दबदबा है - यानी जेनरिक दवाएं जो ब्रांड नाम के तहत बेची जाती हैं, और अक्सर अनब्रांडेड (unbranded) दवाओं से 10-12 गुना तक महंगी होती हैं। डोमेस्टिक ड्रग कंजम्पशन (drug consumption) का 87% हिस्सा ये ब्रांडेड जेनरिक बनाते हैं, जिससे सरकारी खर्चे कम करने के प्रयासों को भारी झटका लगता है। डॉक्टरों की प्रिस्क्राइबिंग हैबिट्स (prescribing habits) भी एक बड़ी वजह हैं। कई डॉक्टर क्वालिटी, दवा कंपनियों से मिलने वाले इंसेंटिव (incentives) और पेशेंट के भरोसे की वजह से महंगी ब्रांडेड दवाएं लिखना पसंद करते हैं, भले ही वे जेनरिक के फायदे जानते हों। फार्मासिस्ट (pharmacists) आमतौर पर जेनरिक डिस्पेंस (dispense) करने में ज्यादा इच्छुक रहते हैं। प्रति व्यक्ति हेल्थकेयर खर्च में हुई भारी बढ़ोतरी, जो 2022 में $79.52 तक पहुंच गया, और जिसमें दवाओं का हिस्सा जेब से होने वाले खर्च का एक बड़ा हिस्सा है, यह जेनरिक दवाओं के व्यापक उपयोग की तत्काल आवश्यकता को उजागर करता है।

रेगुलेटरी हर्डल्स (Regulatory Hurdles) और डॉक्टर की आदतें, जेनरिक को धीमा कर रही हैं

ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945 के रूल 65(11)(a) के तहत, फार्मासिस्ट को डॉक्टर द्वारा लिखी गई ब्रांड-नेम दवाओं को जेनरिक से बदलने की इजाजत नहीं है। यह एक बड़ी रेगुलेटरी रुकावट है, जिससे डॉक्टरों का प्रिस्क्रिप्शन (prescription) पर कंट्रोल ज्यादा रहता है। फिच रेटिंग्स (Fitch Ratings) के एनालिस्ट्स (analysts) का कहना है कि भारत में जेनरिक प्रिस्क्रिप्शन रूल्स को लागू करने में बड़ी एग्जीक्यूशन (execution) चुनौतियां हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि अमेरिका जैसे देशों की तुलना में ड्रग क्वालिटी स्टैंडर्ड्स (drug quality standards) कम सख्त हैं, जिससे अलग-अलग मैन्युफैक्चरर्स (manufacturers) की दवाओं की क्वालिटी और इफेक्टिवनेस (effectiveness) में अंतर आ सकता है। एग्रेसिव मार्केटिंग (aggressive marketing) और डॉक्टरों के साथ रिश्तों के दम पर ब्रांडेड जेनरिक का बढ़ना, सन फार्मा (Sun Pharma), सिप्ला (Cipla), डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज (Dr. Reddy's Laboratories) और ऑरोबिंदो फार्मा (Aurobindo Pharma) जैसी बड़ी इंडियन दवा कंपनियों के प्रॉफिट (profit) को प्रभावित कर सकता है, भले ही उनका ग्लोबल जेनरिक बिजनेस मजबूत हो। प्रति व्यक्ति हेल्थकेयर खर्च $79.52 से बढ़ने की उम्मीद है, खासकर क्रॉनिक बीमारियों (chronic diseases) के बढ़ते मामलों के साथ, जिसके लिए अधिक किफायती इलाज की आवश्यकता है। सरकार 2024 तक सभी जिलों में PMBJP का विस्तार करने और अधिक दवाएं व सर्जिकल आइटम जोड़ने का लक्ष्य रखती है, जिसमें कॉम्प्लेक्स सप्लाई चेन (supply chain) चुनौतियां शामिल हैं।

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