भारत के न्यूट्रास्यूटिकल्स मार्केट में बंपर ग्रोथ, पर रेगुलेटर्स की पैनी नजर!

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारत के न्यूट्रास्यूटिकल्स मार्केट में बंपर ग्रोथ, पर रेगुलेटर्स की पैनी नजर!
Overview

भारत का न्यूट्रास्यूटिकल्स सेक्टर इस समय ज़बरदस्त ग्रोथ दिखा रहा है। बाज़ार का आकार लगातार बढ़ रहा है और 2030-33 तक यह **₹11.55 अरब से ₹75.81 अरब डॉलर** तक पहुँचने का अनुमान है। बढ़ती डिस्पोजेबल इनकम, लाइफस्टाइल में बदलाव और प्रिवेंटिव हेल्थ पर बढ़ते फोकस के कारण इस इंडस्ट्री में साइंस-बैक्ड सॉल्यूशंस की डिमांड बढ़ी है, और लोग अब जनरल वेलनेस से हटकर खास हेल्थ प्रोडक्ट्स की ओर देख रहे हैं।

बाज़ार में उछाल की कहानी, नंबरों से आगे

भारतीय न्यूट्रास्यूटिकल्स मार्केट (Nutraceuticals Market) एक प्रभावशाली ग्रोथ की राह पर है। इस सेक्टर का आकार 2024 में करीब 6.11 अरब डॉलर से लेकर 32.14 अरब डॉलर तक आंका गया है, और एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2030-2033 तक यह 11.55 अरब डॉलर से बढ़कर 75.81 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है। यह ग्रोथ एनुअल 10% से 20% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से हो रही है, जो ग्लोबल एवरेज (लगभग 4.78% से 8%) से काफी ज्यादा है। इस बूम के पीछे कई बड़े कारण हैं: लोगों की डिस्पोजेबल इनकम में बढ़ोतरी, शहरों की बढ़ती आबादी और प्रिवेंटिव हेल्थ यानी बीमारी से बचाव पर बढ़ता ध्यान। ओबेसिटी, डायबिटीज और हार्ट जैसी लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते मामलों ने भी इस सेक्टर को बढ़ावा दिया है। साथ ही, बढ़ती उम्र वाली आबादी के लिए हेल्थ सॉल्यूशंस की मांग भी बढ़ रही है।

कंज्यूमर की बदलती पसंद और कॉम्पिटिशन

सिर्फ इकोनॉमिक फैक्टर ही नहीं, बल्कि कंज्यूमर के व्यवहार में आए बदलाव भी इस सेक्टर के लिए गेम-चेंजर साबित हो रहे हैं। खासकर युवा पीढ़ी (Gen Z और Millennials) के बीच ऐसे न्यूट्रास्यूटिकल्स की मांग बढ़ रही है जो साइंस पर आधारित हों, जिनके पुख्ता सबूत हों और जिन्हें पारदर्शी तरीके से बनाया गया हो। इसका मतलब है कि अब जनरल वेलनेस क्लेम से हटकर, ज़्यादातर लोग खास हेल्थ कंडीशंस के लिए क्लिनिकली अप्रूव्ड सॉल्यूशंस चाहते हैं। पर्सनलाइज्ड न्यूट्रिशन (Personalized Nutrition) और 'पिल से हटकर' यानी आसानी से लिए जा सकने वाले फॉर्मेट्स की डिमांड भी बढ़ रही है। मार्केट में कड़ी टक्कर है, जिसमें Dabur और Patanjali Ayurved जैसी भारतीय कंपनियां हर्बल और आयुर्वेदिक प्रोडक्ट्स में अपनी धाक जमा रही हैं, वहीं Amway और Himalaya Wellness Company जैसे ग्लोबल प्लेयर्स विटामिन और डायटरी सप्लीमेंट्स में आगे हैं। कई बड़ी कंपनियां मर्जर और एक्वीजीशन (M&A), डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर (D2C) मॉडल और एक्सपोर्ट बढ़ाकर अपनी ग्रोथ बढ़ा रही हैं। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स भी इस मार्केट को आसानी से एक्सेसिबल बना रहे हैं और इनोवेशन को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत की आयुर्वेद और बॉटनिकल इंग्रेडिएंट्स की समृद्ध विरासत भी इसे एक यूनिक कॉम्पिटिटिव एज देती है, जो पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक साइंस से जोड़ती है।

रेगुलेटरी चुनौतियां और 'बेयर केस'

हालांकि, इस सुनहरे भविष्य के रास्ते में कुछ बड़ी रेगुलेटरी चुनौतियां भी हैं जो इस ग्रोथ को धीमा कर सकती हैं। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) इस सेक्टर को रेगुलेट करती है। FSSAI ने 2016 में हेल्थ सप्लीमेंट्स और न्यूट्रास्यूटिकल्स के लिए नियम बनाए थे। लेकिन अब ऐसी चर्चाएं हैं कि 'डिजीज रिस्क रिडक्शन' क्लेम्स की देखरेख सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) को सौंपी जा सकती है, जिससे फार्मा सेक्टर जैसी कड़ी जांच हो सकती है। सबसे बड़ा बदलाव 1 जनवरी, 2026 से होने वाला है, जब FSSAI को सभी फूड सेफ्टी अप्रूवल के लिए साइंटिफिक एविडेंस (वैज्ञानिक प्रमाण) देना अनिवार्य होगा। इसका मतलब है कि सिर्फ भरोसे पर नहीं, बल्कि पुख्ता सबूतों पर काम होगा। 2020 से 2023 के बीच, लगभग 20-40% न्यूट्रास्यूटिकल एप्लीकेशंस को रिजेक्ट या विद्ड्रॉ करना पड़ा था। इसके मुख्य कारण थे मिलावट, गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज (GMP) का पालन न करना, ऐसे क्लेम करना जिनके कोई सबूत नहीं थे, या ऐसे प्रोडक्ट्स जो दवा जैसे असर दिखा रहे थे। नकली प्रोडक्ट्स और भ्रामक विज्ञापनों के कारण कंज्यूमर में अविश्वास भी एक बड़ी समस्या है। साथ ही, कुछ कंज्यूमर सेगमेंट के लिए कीमत एक मुद्दा है, क्योंकि हेल्दी अल्टरनेटिव्स अक्सर महंगे माने जाते हैं।

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