India Nutraceutical Market: 2030 तक ₹57 अरब डॉलर के पार, सेहत पर बढ़ता फोकस दे रहा बूम

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
India Nutraceutical Market: 2030 तक ₹57 अरब डॉलर के पार, सेहत पर बढ़ता फोकस दे रहा बूम

भारत का न्यूट्रास्युटिकल सेक्टर 2024 के **₹30 अरब डॉलर** से बढ़कर 2030 तक **₹57 अरब डॉलर** तक पहुंचने की उम्मीद है। इसके पीछे लोगों का प्रीवेंशन हेल्थकेयर पर बढ़ता फोकस है। यह सेक्टर फार्मा और कंज्यूमर गुड्स कंपनियों के लिए बड़ा मौका लेकर आया है, लेकिन निवेशकों को रेगुलेटरी रिस्क और प्रोडक्ट वैलिडेशन पर पैनी नज़र रखनी होगी।

क्या हुआ है?

भारत का न्यूट्रास्युटिकल बाजार तेजी से विस्तार के लिए तैयार है। CareEdge की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, यह इंडस्ट्री 2024 में लगभग $30 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक $57 अरब डॉलर तक पहुँच जाएगी। अनुमान है कि 2026 तक यह $37-38 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है। यह बदलाव भारत के हेल्थकेयर को लेकर एक बड़ा स्ट्रक्चरल शिफ्ट दिखा रहा है, जिसमें इलाज पर ध्यान देने के बजाय बीमारियों से बचाव पर ज़ोर दिया जा रहा है।

प्रीवेंशन हेल्थ की ओर शिफ्ट क्यों मायने रखता है?

इन्वेस्टर्स और मार्केट पर नज़र रखने वालों के लिए, इस सेक्टर का विकास कंज्यूमर के व्यवहार में एक बड़ा बदलाव दर्शाता है। परिवार अब सिर्फ बीमारी के लक्षणों के इलाज के बजाय लंबे समय तक सेहत, इम्युनिटी और बीमारियों से बचाव को ज़्यादा महत्व दे रहे हैं। न्यूट्रास्युटिकल्स - ऐसे प्रोडक्ट जो न्यूट्रिशनल और फार्मास्युटिकल फायदे मिलाते हैं, जैसे डाइटरी सप्लीमेंट्स, फोर्टिफाइड फूड और हर्बल फॉर्मूलेशन - इस नए अप्रोच का अहम हिस्सा बन गए हैं। यह शिफ्ट इंडस्ट्री के लिए लगभग 10.5% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) को सपोर्ट कर रहा है, जिससे यह हेल्थकेयर और फूड प्रोसेसिंग इकोसिस्टम का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया है।

सेक्टर के मुख्य ड्राइवर्स

इस विस्तार के पीछे कई कारण हैं। ई-कॉमर्स और डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म्स का बढ़ता जाल इन प्रोडक्ट्स को ज़्यादा लोगों तक पहुंचा रहा है, खासकर शहरी इलाकों में। इसके अलावा, भारत के विशाल बायो-एग्रीकल्चरल बेस से कच्चे माल की सोर्सिंग में कंपनीज़ को बड़ा फायदा मिल रहा है, जिससे उनकी लागत कॉम्पिटिटिव बनी हुई है। सरकार की तरफ से फूड सेफ्टी और स्टैंडर्डाइजेशन को बेहतर बनाने वाली पॉलिसीज़ भी इस इंडस्ट्री को फॉर्मलाइज करने में मदद कर रही हैं, जिसमें पहले कई अनऑर्गनाइज्ड प्लेयर हुआ करते थे।

इंडस्ट्री के सामने चुनौतियाँ

सकारात्मक संभावनाओं के बावजूद, इस सेक्टर के सामने कुछ बड़ी चुनौतियाँ भी हैं। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) और मिनिस्ट्री ऑफ फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज (MoFPI) की ओर से क्वालिटी कंट्रोल को लेकर कड़े नियमों के चलते रेगुलेटरी स्क्रूटनी बढ़ रही है। कंपनीज़ को एक कॉम्प्लेक्स रेगुलेटरी माहौल से गुजरना होगा, जिसमें प्रोडक्ट क्लेम्स के लिए वैज्ञानिक सत्यापन (Scientific Validation) की ज़रूरत पड़ती है। इंडस्ट्री में कंज्यूमर की जागरूकता की कमी और भ्रामक दावों के मामले भी हैं, जो रेगुलेटरी एक्शन का कारण बन सकते हैं। बिज़नेस के लिए, कंप्लायंस कॉस्ट और प्रोडक्ट एफिकेसी साबित करने के लिए लगातार R&D की ज़रूरत प्रॉफिट मार्जिन पर असर डाल सकती है।

लिस्टेड कंपनियां क्या भूमिका निभा रही हैं?

भारतीय स्टॉक मार्केट की कई स्थापित कंपनियां न्यूट्रास्युटिकल स्पेस में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। Sun Pharma जैसी बड़ी फार्मा कंपनियां और Dabur India और Zydus Wellness जैसी कंज्यूमर गुड्स कंपनियां इस सेक्टर में सक्रिय हैं। ये अपनी मौजूदा डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और ब्रांड ट्रस्ट का फायदा उठाकर मार्केट शेयर हासिल कर रही हैं। ये कंपनियां अक्सर अपने न्यूट्रास्युटिकल डिवीज़न को ग्रोथ का मुख्य स्तंभ मानती हैं, जिससे वे अपने कोर फार्मा या फूड बिज़नेस से रेवेन्यू को डाइवर्सिफाई करती हैं।

इन्वेस्टर्स को क्या ट्रैक करना चाहिए?

इस स्पेस पर नज़र रखने वाले इन्वेस्टर्स को टॉप-लाइन रेवेन्यू ग्रोथ से आगे देखना चाहिए। मुख्य रूप से यह देखना होगा कि कंपनियां बदलते रेगुलेटरी माहौल को कितनी प्रभावी ढंग से मैनेज कर रही हैं और क्या वे वैज्ञानिक डेटा के ज़रिए अपने प्रोडक्ट्स के हेल्थ बेनिफिट्स को साबित कर पाती हैं। जैसे-जैसे कॉम्पिटिशन बढ़ेगा, कंप्लायंस कॉस्ट को मैनेज करते हुए प्रीमियम पोजिशनिंग बनाए रखना लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी के लिए ज़रूरी होगा। FSSAI गाइडलाइन्स या फंक्शनल फूड सेगमेंट में बड़े प्रोडक्ट लॉन्च पर अपडेट्स पर नज़र रखने से भी व्यक्तिगत कंपनियों के सेक्टर में मैच्योर होने के शुरुआती संकेत मिल सकते हैं।

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