India MedTech Market: 2030 तक ₹2,900 अरब का बनेगा, एक्सपोर्ट होगा दोगुना!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India MedTech Market: 2030 तक ₹2,900 अरब का बनेगा, एक्सपोर्ट होगा दोगुना!

भारत का मेडिकल टेक्नोलॉजी (MedTech) मार्केट 2030 तक 35 अरब डॉलर यानी करीब 2,900 अरब रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। देश की बढ़ती घरेलू मांग और एक्सपोर्ट में हो रही बढ़ोतरी इस ग्रोथ की मुख्य वजहें हैं।

मेडटेक सेक्टर में तूफानी तेजी

भारत का मेडिकल टेक्नोलॉजी उद्योग तेजी से आगे बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक इस सेक्टर का बाजार 35 अरब डॉलर (लगभग 2,900 अरब रुपये) तक पहुंच सकता है। Bain & Company की रिपोर्ट बताती है कि यह ग्रोथ देश की मजबूत स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरतें और भारतीय-निर्मित मेडिकल डिवाइसेस की बढ़ती ग्लोबल पहुंच से संभव होगी।

घरेलू और ग्लोबल स्तर पर विस्तार

एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 2030 तक 132 अरब डॉलर की मांग का अनुमान है, और भारत इस ग्रोथ में अहम भूमिका निभाएगा। फाइनेंशियल ईयर 2025 तक, भारत से मेडिकल डिवाइसेस का एक्सपोर्ट 4 अरब डॉलर था, जो 2030 तक बढ़कर 8 अरब डॉलर (लगभग 660 अरब रुपये) तक पहुंचने की उम्मीद है। यानी, एक्सपोर्ट में हर साल 20% से ज्यादा की ग्रोथ देखने को मिल सकती है।

Poly Medicure जैसी कंपनियां 125 से अधिक देशों में सप्लाई कर रही हैं, वहीं Wipro GE करीब 70 देशों में अपनी मौजूदगी रखती है। यह दिखाता है कि भारतीय कंपनियां लागत-प्रभावी समाधानों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने में सक्षम हैं।

हाई-एंड इंपोर्ट की चुनौती

एक्सपोर्ट में तेजी के बावजूद, भारत अभी भी हाई-एंड सर्जिकल और इलेक्ट्रो-मेडिकल उपकरणों के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भर है। देश हर साल ऐसे उपकरणों के इंपोर्ट पर 5.5 अरब डॉलर (लगभग 450 अरब रुपये) खर्च करता है। यह घरेलू बाजार में एक बड़ी कमी को दर्शाता है, जहां भारतीय कंपनियां अभी भी उन्नत और हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग सेगमेंट में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।

भविष्य की ग्रोथ के फैक्टर

निवेशकों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारतीय कंपनियां किस तरह से बेसिक, किफायती इनोवेशन और हाई-एंड मैन्युफैक्चरिंग के बीच की खाई को पाट पाती हैं। नए उत्पादों के लिए मजबूत क्लिनिकल एविडेंस बनाना, रेगुलेटरी विशेषज्ञता और कमर्शियलाइजेशन स्ट्रेटेजीज इस सेक्टर की सफलता में अहम भूमिका निभाएंगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि कंपनियां कैसे अधिक जटिल मेडिकल उपकरणों की ओर बढ़ती हैं और क्या वे लाभ मार्जिन बनाए रखते हुए हाई-एंड इंपोर्ट पर देश की निर्भरता को कम कर पाती हैं।

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