भारत सरकार देश में बिक रहे घटिया मेडिकल डिवाइसेस से चिंतित है और अब क्वालिटी कंट्रोल को लेकर बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। इस बदलाव के तहत, अब डिजाइन के बजाय तैयार प्रोडक्ट की क्वालिटी पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा, जिससे भारत में बनी डिवाइसेस की वैल्यू एडिशन **40-45%** तक पहुंचे।
मेडिकल डिवाइसेस पर सरकार की कड़ी नजर
भारत सरकार ने देश के मेडिकल डिवाइसेस मार्केट में घटिया क्वालिटी वाले प्रोडक्ट्स की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई है. फार्मास्युटिकल्स विभाग के सेक्रेटरी मनोज जोशी ने हाल ही में CII Global MedTech Summit में कहा कि बाज़ार में सस्ते और खराब क्वालिटी के डिवाइसेस की बाढ़ आ गई है, जिनमें सामान्य डिस्पोजेबल से लेकर एडवांस्ड मेडिकल इक्विपमेंट तक शामिल हैं. सरकार अब एक ऐसे रेगुलेटरी फ्रेमवर्क पर जोर दे रही है, जो प्रोडक्ट के डिजाइन से ज़्यादा उसके फाइनल क्वालिटी पर ध्यान केंद्रित करे.
रेगुलेटरी फोकस में बदलाव
सरकार का मानना है कि दवाएं (Drugs) केमिकल होती हैं, लेकिन मेडिकल डिवाइसेस इंजीनियरिंग प्रोडक्ट होते हैं. एक डिवाइस का डिजाइन कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसमें इस्तेमाल होने वाला रॉ मटेरियल या निर्माण की प्रक्रिया घटिया है, तो फाइनल प्रोडक्ट या तो बेकार होगा या जानलेवा साबित हो सकता है. मौजूदा रेगुलेटरी सिस्टम तैयार प्रोडक्ट्स की क्वालिटी को कंट्रोल करने में संघर्ष कर रहा है. इस समस्या से निपटने के लिए, सरकार यूरोप की तरह थर्ड-पार्टी सर्टिफिकेशन मॉडल अपनाने पर विचार कर रही है. यह एक ऐसा कदम हो सकता है जो देश के टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के पूरी तरह से तैयार होने में लगने वाले एक दशक से ज़्यादा के समय में क्वालिटी गैप को भरने में मदद करेगा.
डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन को बढ़ावा
रेगुलेशन के अलावा, सरकार देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को और मजबूत बनाने के लिए भी कदम उठा रही है. इंडस्ट्री को सिर्फ इम्पोर्टेड पार्ट्स को असेंबल करने के बजाय, वैल्यू एडिशन को 40% से 45% तक पहुंचाने का लक्ष्य है. अधिकारियों का कहना है कि प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम्स का विस्तार किया जा सकता है, ताकि उन कंपनियों को भी मदद मिल सके जिन्होंने पहले से ही लोकल कैपेसिटी में निवेश किया है लेकिन अभी तक उसका फायदा नहीं उठा पा रही हैं. सरकार का मानना है कि यह कदम छोटे और मध्यम उद्योगों (SMEs) और कंपोनेंट निर्माताओं को क्वालिटी में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करेगा, जिससे बायर का भरोसा बढ़ेगा और हेल्थकेयर इकोसिस्टम अधिक विश्वसनीय बनेगा.
इंडस्ट्री पर क्या होगा असर?
मेडिकल डिवाइसेस सेक्टर में काम कर रही कंपनियों के लिए यह बदलाव एक सख्त बिजनेस माहौल का संकेत देता है. जो कंपनियां हायर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को पूरा नहीं कर पाएंगी या वैल्यू-एडिशन के लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाएंगी, उन्हें ज़्यादा जांच का सामना करना पड़ सकता है या वे सरकारी फायदों से चूक सकती हैं. हालांकि, इस पॉलिसी का मकसद भारत को क्वालिटी मेडिकल डिवाइसेस का ग्लोबल हब बनाना है, लेकिन यह निर्माताओं के लिए अपनी टेस्टिंग कैपेसिटी को तुरंत अपग्रेड करने की ज़रूरत भी पैदा करता है. निवेशकों और हितधारकों को फिनिश्ड-प्रोडक्ट टेस्टिंग से जुड़े नए रेगुलेटरी गाइडलाइन्स और PLI एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया में किसी भी बदलाव पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि ये सीधे तौर पर डोमेस्टिक प्लेयर्स के ऑपरेशनल कॉस्ट और ग्रोथ पर असर डालेंगे.
