Indian Pharmacopoeia Commission ने दवाइयों से जुड़ी गलतियों को रोकने के लिए एक नया नेशनल फ्रेमवर्क पेश किया है। अब मरीजों तक दवा पहुँचने से पहले ही 'Near-Miss' गलतियों की निगरानी की जाएगी, जिससे फार्मा कंपनियों पर भविष्य में नए पैकेजिंग और सुरक्षा नियम लागू हो सकते हैं।
अब गलती होने से पहले ही होगा सुधार
अब तक का सिस्टम मरीजों को दवा के रिएक्शन (Adverse Drug Reaction) होने के बाद रिपोर्ट करता था, लेकिन Indian Pharmacopoeia Commission (IPC) ने अब एक प्रोएक्टिव कदम उठाया है। इस नए फ्रेमवर्क का मकसद 'Near-Miss' घटनाओं को पकड़ना है—जैसे दवा की डोज में गड़बड़ी या गलत कॉम्बिनेशन। यह कदम Pharmacovigilance Programme of India (PvPI) के तहत उठाया गया है।
कैसे काम करेगा सिस्टम?
इस सिस्टम को पूरी तरह से 'नॉन-प्यूनिटिव' (गैर-दंडात्मक) रखा गया है। इसका मतलब है कि मकसद किसी को जिम्मेदार ठहराना नहीं, बल्कि अस्पताल और फार्मेसी के कामकाज में आ रही खामियों को दूर करना है। डेटा को Central Drugs Standard Control Organisation (CDSCO) के SUGAM पोर्टल से जोड़ा जाएगा, जिससे रेग्युलेटर्स रियल-टाइम में अलर्ट जारी कर सकेंगे।
फार्मा कंपनियों के लिए बढ़ेगी चुनौती
फार्मा सेक्टर के लिए यह रेगुलेटरी स्क्रूटनी का एक नया स्तर है। अगर डेटा में बार-बार पैकेजिंग या लेबलिंग की गलतियाँ सामने आईं, तो सरकार भविष्य में दवाओं की पैकेजिंग और इंसर्ट्स को बदलने के लिए सख्त नियम बना सकती है। इससे कंपनियों पर Compliance और ऑपरेशनल लागत का बोझ बढ़ सकता है।
अस्पतालों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी
अस्पतालों और क्लीनिक्स को अब इन गलतियों को लॉग करने के लिए एक मजबूत इंटरनल सिस्टम तैयार करना होगा। इससे क्लिनिकल स्टाफ पर प्रशासनिक काम (Administrative Burden) बढ़ सकता है। निवेशकों की नजर अब इस बात पर है कि सरकार इसे देश भर में कितनी तेजी से लागू करती है और क्या इसके कारण इंडस्ट्री के लिए नए स्टैंडर्डाइज्ड सुरक्षा प्रोटोकॉल बनते हैं या नहीं।
