स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने ऑर्गन और टिश्यू ट्रांसप्लांट में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की सुरक्षा की निगरानी के लिए एक नई 'Biovigilance' पहल शुरू की है। Indian Pharmacopoeia Commission (IPC) द्वारा संचालित यह कार्यक्रम प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स में डिजिटल रिपोर्टिंग को बढ़ावा देगा, जिससे फार्मा कंपनियों के लिए क्वालिटी स्टैंडर्ड्स और सख्त होंगे।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने ट्रांसप्लांट के दौरान इस्तेमाल होने वाली दवाओं की सुरक्षा जांच के लिए एक नेशनल फ्रेमवर्क को औपचारिक रूप दिया है। Indian Pharmacopoeia Commission (IPC) के नेतृत्व में, यह पहल उन कमियों को दूर करेगी जो अब तक ट्रांसप्लांट-विशिष्ट रिएक्शन के बजाय सामान्य दवा परिणामों पर केंद्रित थीं।
हेल्थकेयर में डिजिटल निगरानी का विस्तार
इस पहल का मुख्य लक्ष्य डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए दवाओं के विपरीत प्रभावों (Adverse Drug Reaction) की निगरानी करना है। इसके लिए मोबाइल एप्स और QR-कोड आधारित सिस्टम को प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स तक ले जाया जाएगा। फिलहाल देश भर में 1,150 एडवर्स ड्रग रिएक्शन सेंटर और 773 मेडिकल-डिवाइस मॉनिटरिंग हब काम कर रहे हैं, जिनके दायरे को अब और बढ़ाया जाएगा।
फार्मा इंडस्ट्री पर असर
यह कदम नेशनल फॉर्म्युलरी ऑफ इंडिया (NFI) के 7वें एडिशन के साथ जोड़ा गया है। IPC अब स्टेट फार्मेसी काउंसिल और जन औषधि केंद्रों के साथ मिलकर इन मानकों को रिटेल फार्मा चैनल्स तक पहुँचाएगी। फार्मा कंपनियों को अब अपने प्रोडक्ट डॉक्यूमेंटेशन और कंप्लायंस प्रोसेस को इन नए राष्ट्रीय बेंचमार्क के अनुसार अपडेट करना होगा, जिससे क्वालिटी कंट्रोल और रेगुलेटरी रिपोर्टिंग में बदलाव आ सकता है।
तकनीक और सस्टेनेबल लैब्स
IPC अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जरिए फार्माकोविजिलेंस पैटर्न को समझने की तैयारी कर रही है। साथ ही, लैबोरेटरी प्रैक्टिसेज में भी बदलाव किए जा रहे हैं, जिसमें एनिमल टेस्टिंग को कम करना और कार्सिनोजेनिक सॉल्वेंट्स के इस्तेमाल को धीरे-धीरे खत्म करना शामिल है। निवेशकों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि देश भर के स्वास्थ्य केंद्रों में इन डिजिटल टूल्स को कितनी तेजी से अपनाया जाता है और इसका फार्मा सप्लाई चेन पर क्या असर पड़ता है।
