डिजिटल की दौड़ में एफिशिएंसी पीछे क्यों?
ये एक ऐसी स्थिति है जहां टेक्नोलॉजी तो बड़ी मात्रा में हॉस्पिटल में पहुंच गई है, पर उसका पूरा फायदा नहीं मिल रहा। जहां एक तरफ लगभग 95% हॉस्पिटल ने हॉस्पिटल इन्फॉर्मेशन सिस्टम (HIS) और करीब 66% ने इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड (EMR) सिस्टम अपना लिए हैं, वहीं दूसरी तरफ रोबोटिक प्रोसेस ऑटोमेशन (RPA) जैसी एडवांस ऑटोमेशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल 25% से भी कम हो रहा है। इसका सीधा मतलब है कि बहुत सारा क्लिनिकल और एडमिनिस्ट्रेटिव (Administrative) काम आज भी भारी मैनुअल (Manual) एफर्ट्स और डॉक्यूमेंटेशन (Documentation) पर निर्भर है।
ऑपरेशनल इफ़िशिएंसी पर असर
इस टेक्नोलॉजी-एडॉप्शन (Technology-Adoption) और ऑटोमेशन (Automation) के बीच बड़े गैप (Gap) की वजह से हॉस्पिटल की ऑपरेशनल इफ़िशिएंसी (Operational Efficiency) पर बुरा असर पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, केवल करीब 34% हॉस्पिटल ही ऐसे हैं जो रियल-टाइम एंटरप्राइज डैशबोर्ड (Real-time Enterprise Dashboards) का इस्तेमाल कर पाते हैं, जिससे डिसीजन मेकिंग (Decision Making) साइकल (Cycle) धीमा हो जाता है। भारत के बड़े हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स जैसे Apollo Hospitals (मार्केट कैप करीब ₹1.0 ट्रिलियन, P/E 62.1) और Max Healthcare Institute (मार्केट कैप करीब ₹982.7 बिलियन, P/E 69.2) भी इस चुनौती से जूझ रहे हैं। इन कंपनियों के लिए, डिजिटल एसेट्स (Digital Assets) से मिलने वाली एफिशिएंसी सीधे उनके वैल्यूएशन (Valuation) और कॉम्पिटिटिव पोजीशन (Competitive Position) को प्रभावित करती है।
सेक्टर की ग्रोथ और इंटीग्रेशन की जरूरत
इंडियन डिजिटल हेल्थ मार्केट का भविष्य काफी मजबूत दिख रहा है। अनुमान है कि यह मार्केट 2033 तक USD 76 बिलियन से ऊपर पहुँच जाएगा, जिसमें सालाना 18.81% से लेकर 25.12% तक की ग्रोथ रेट (Growth Rate) देखने को मिल सकती है। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) जैसे सरकारी इनिशिएटिव्स (Initiatives) भी इस डिजिटल क्रांति को बढ़ावा दे रहे हैं। लेकिन, असली चुनौती इंटीग्रेशन (Integration) में है। केवल लगभग 32% हॉस्पिटल ही अपने मुख्य सिस्टम्स को पूरी तरह आपस में जोड़ पाए हैं। यही वजह है कि करीब 60% हॉस्पिटल अब अपनी डिजिटल इन्वेस्टमेंट (Digital Investment) बढ़ाने की योजना बना रहे हैं, लेकिन उनका फोकस नई टेक्नोलॉजी लाने से ज्यादा मौजूदा सिस्टम को ऑप्टिमाइज़ (Optimize) करने और बेहतर गवर्नेंस (Governance) पर है।
बिखरे हुए डिजिटल इकोसिस्टम का रिस्क
हेल्थकेयर में इस बड़े डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन (Digital Transformation) के अपने रिस्क (Risks) भी हैं। टेक्नोलॉजी अपनाने और असली ऑटोमेशन के बीच का गैप एक बिखरा हुआ डिजिटल इकोसिस्टम (Digital Ecosystem) तैयार कर रहा है। इसका मतलब है हायर ऑपरेशनल कॉस्ट (Higher Operational Cost) और डेटा साइलो (Data Silos) व मैनुअल डेटा रीकॉन्सिलिएशन (Manual Data Reconciliation) के कारण मेडिकल एरर (Medical Errors) का खतरा। कुछ हॉस्पिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) पर $100 मिलियन से ज्यादा खर्च कर रहे हैं, पर इंटीग्रेशन की कमी से ROI (Return on Investment) कम हो रहा है। मेडिकल डिवाइस रूल्स 2017 और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 जैसे रेगुलेटरी फ्रेमवर्क (Regulatory Framework) के बावजूद, डेटा प्राइवेसी (Data Privacy) और सिक्योरिटी (Security) की जटिलताएं डेटा के प्रभावी इस्तेमाल में बाधा डाल सकती हैं।
ऑप्टिमाइज्ड डिजिटल हेल्थ का आउटलुक
इन चुनौतियों के बावजूद, इंडिया के डिजिटल हेल्थ सेक्टर का भविष्य ब्राइट (Bright) है। फोकस अब मौजूदा डिजिटल इन्वेस्टमेंट से वैल्यू निकालने पर है, जिसके लिए बेहतर इंटीग्रेशन और गवर्नेंस प्रैक्टिस (Governance Practices) जरूरी हैं। इंडस्ट्री का मानना है कि अगले फेज की ग्रोथ इस बात पर निर्भर करेगी कि डिजिटल सिस्टम्स को केयर डिलीवरी (Care Delivery) में कितनी प्रभावी ढंग से एम्बेड (Embed) किया जाता है। हेल्थकेयर सेक्टर, अपनी नॉन-साइक्लिकल डिमांड (Non-cyclical Demand) के लिए जाना जाता है, और बढ़ते हेल्थ खर्च, बूढ़ी होती आबादी और हेल्थ कॉन्शियसनेस (Health Consciousness) के चलते आगे बढ़ता रहेगा। एनालिस्ट्स (Analysts) का भी इस सेक्टर के लीडिंग स्टॉक्स (Leading Stocks) के लिए सेंटीमेंट (Sentiment) पॉजिटिव है।