ऊपर से देखने में स्वास्थ्य बजट में यह बढ़ोतरी काफी अच्छी लग सकती है, लेकिन जब आप इसे लगातार बढ़ती मेडिकल महंगाई के चश्मे से देखते हैं, तो पूरी तस्वीर बदल जाती है। इस बजट के आवंटन (allocations) को अगर पिछले सालों के असली खर्च (actual spending) से तुलना करें, तो ऐसा लगता है कि सरकार का स्वास्थ्य सेवाओं पर असली खर्च कम हो रहा है। यह वाकई चिंता का विषय है।
मेडिकल महंगाई का असर
2026-27 के यूनियन बजट में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को करीब ₹1.06 लाख करोड़ का बजट मिला है। यह आंकड़ा कागजों पर तो बड़ा दिखता है, पर देश में मेडिकल महंगाई 11.5% से 15% सालाना की रफ्तार से बढ़ रही है। इस महंगाई को देखते हुए, असली बढ़ोतरी (real-term growth) बहुत मामूली है, और कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक तो यह घट भी गई है। 2025-26 के बजट अनुमान (Budget Estimates) में, असली आवंटन 2020-21 के असली खर्च से 4.7% से 7% तक कम पाया गया था। इसका सीधा मतलब है कि बजट के आंकड़े बढ़ने के बावजूद, असल में दी जाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता घट सकती है। इससे भी बड़ी बात यह है कि राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में स्वास्थ्य क्षेत्र का हिस्सा 2020-21 में 0.37% था, जो 2025-26 के अनुमानों में घटकर 0.29% रह गया है। यही ट्रेंड कुल यूनियन बजट में स्वास्थ्य की हिस्सेदारी में भी दिखा है, जो 2020-21 में 2.26% थी, वह घटकर करीब 2.05% रह गई है। यह सब संकेत देता है कि सरकार अब सार्वजनिक स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर को उतनी प्राथमिकता नहीं दे रही है।
बदलती प्राथमिकताएं
सरकारी प्राथमिकताओं में भी एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। ऐसा लगता है कि कुछ योजनाएं जो सीधे तौर पर व्यावसायिक हितों को बढ़ावा देती हैं, उन्हें ज्यादा फंड मिल रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर चलने वाले अहम सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों (public health programs) पर पैसों का दबाव साफ दिख रहा है। नेशनल हेल्थ मिशन (NHM), जो प्राइमरी और सेकेंडरी हेल्थकेयर, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और विभिन्न बीमारियों की रोकथाम के लिए रीढ़ की हड्डी की तरह है, उसके लिए राज्यों को दी जाने वाली केंद्रीय सहायता (central share for state transfers) पिछले एक दशक में काफी कम हो गई है। 2014-15 में यह 75.9% थी, जो 2024-25 तक घटकर सिर्फ 43% रह गई। हालांकि 2026-27 के लिए NHM का कुल बजट ₹39,390 करोड़ हो गया है, लेकिन राज्यों को मिलने वाली सीधी केंद्रीय मदद में लगातार कमी को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। इसका सीधा असर जमीनी स्तर की जरूरी सेवाओं और आशा (ASHA) जैसी फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की सैलरी और काम पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY), जो एक पब्लिक-प्राइवेट इंश्योरेंस स्कीम है, उसे लगातार अच्छा खासा फंड मिलता रहा है। 2026-27 के लिए PMJAY को करीब ₹9,500 करोड़ का आवंटन मिला है, जो पिछले साल से थोड़ी ज्यादा है। हालांकि, इस योजना की प्रभावशीलता और इसके द्वारा निजी अस्पतालों को मिलने वाले फायदे को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
बायोफार्मा पर फोकस
एक तरफ जहां सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च को लेकर चिंताएं हैं, वहीं भारत के फार्मा और हेल्थकेयर इंडस्ट्री को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने पर खास जोर दिया गया है। 'बायोफार्मा शक्ति' (Biopharma Shakti) पहल के तहत अगले पांच साल में ₹10,000 करोड़ खर्च करके भारत को बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स के उत्पादन का एक ग्लोबल हब बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इस योजना में नए नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (NIPERs) की स्थापना और मौजूदा को आधुनिक बनाना शामिल है। इसके अलावा, मेडिकल टूरिज्म हब विकसित करने और देश के डिजिटल हेल्थ इकोसिस्टम को मजबूत करने के प्रस्ताव बताते हैं कि सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के कमर्शियलाइजेशन (commercialization) की ओर तेजी से बढ़ रही है। कुछ खास कैंसर और दुर्लभ बीमारियों की दवाओं पर कस्टम ड्यूटी में छूट जैसे कदम मरीजों के लिए राहत ला सकते हैं, लेकिन इन सब के बीच, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कुल क्षमता पर इनका क्या असर होगा, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।