केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने Drugs Rules, 1945 के नियम 31 में बदलाव किया है। अब भारत में आयात की जाने वाली दवाओं की एक्सपायरी डेट कम से कम 1 साल शेष होनी अनिवार्य है, जिससे सप्लाई चेन और वर्किंग कैपिटल पर सीधा असर पड़ेगा।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने फार्मा सेक्टर के लिए नियमों को सख्त कर दिया है। Drugs Rules, 1945 के तहत अब किसी भी विदेशी दवा को भारत में तभी प्रवेश मिलेगा जब उसकी बची हुई 'शेल्फ लाइफ' (Shelf Life) कम से कम 1 साल हो। इस कदम का मुख्य मकसद देश में एक्सपायरी के करीब पहुंच चुकी दवाओं की एंट्री को पूरी तरह रोकना और मेडिकल वेस्ट को कम करना है।
प्रोक्योरमेंट और सप्लाई चेन पर असर
अब तक कई फार्मा कंपनियां और आयातक कम एक्सपायरी वाली दवाएं मंगाते थे, जिससे इन्वेंट्री जल्दी निकल जाती थी। लेकिन नए नियम के बाद, कंपनियों को ग्लोबल मैन्युफैक्चरर्स के साथ अपने कॉन्ट्रैक्ट्स फिर से नेगोशिएट करने होंगे। इस बदलाव से वर्किंग कैपिटल पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि शिपमेंट और कस्टम क्लीयरेंस के दौरान समय का ध्यान रखना बेहद जरूरी होगा। यदि दवाएं तय मानकों पर खरी नहीं उतरीं, तो शिपमेंट रिजेक्ट होने का खतरा है, जिससे कुछ विशेष दवाओं की कमी भी हो सकती है। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या यह नियम कंपनियों की ऑपरेशनल लागत बढ़ाता है या इन्वेंट्री राइट-ऑफ का कारण बनता है।
दवाओं के लिए खास छूट
सरकार ने कुछ संवेदनशील दवाओं के लिए नियम में रियायत दी है। जिन बायोलॉजिकल दवाओं और रेडियो-फार्मास्यूटिकल्स (Radiopharmaceuticals) की लाइफ कम होती है, उनके लिए 60 फीसदी रेजिडुअल शेल्फ लाइफ का नियम रखा गया है। यह छूट उन दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए दी गई है, जिनकी एक्सपायरी अवधि स्वाभाविक रूप से कम होती है।
निवेशकों के लिए संकेत
फार्मा कंपनियों के आगामी क्वार्टरली रिजल्ट्स और मैनेजमेंट कमेंट्री में इस नियम का असर साफ नजर आ सकता है। कंपनियों की ओर से इन्वेंट्री मैनेजमेंट और लॉजिस्टिक्स में किए गए बदलावों पर नजर रखना जरूरी है, क्योंकि यही भविष्य में उनके मार्जिन्स को तय करेंगे।
