भारत सरकार ने मेडिकल डिवाइस के बाहरी स्टेरिलाइजेशन (Sterilization) के नियमों को आसान बनाया है, लेकिन एक नई लिबेलिंग (Labelling) की शर्त ने इंडस्ट्री को चिंता में डाल दिया है। नई गाइडलाइंस के मुताबिक, अब प्रोडक्ट पैकेजिंग पर स्टेरिलाइजेशन फैसिलिटी का लाइसेंस नंबर छापना होगा, जिससे सप्लाई चेन (Supply Chain) की फ्लेक्सिबिलिटी पर सवाल उठ रहे हैं।
नियम आसान, पर नई शर्त से दिक्कत!
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (Ministry of Health and Family Welfare) ने मेडिकल डिवाइस रूल्स, 2017 में एक बड़ा बदलाव किया है। अब अगर कोई कंपनी मेडिकल डिवाइस के स्टेरिलाइजेशन के लिए किसी दूसरी फैसिलिटी का इस्तेमाल करती है, तो उसे अलग से 'लोन लाइसेंस' (Loan Licence) लेने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, बशर्ते उस फैसिलिटी के पास पहले से ही वैलिड लाइसेंस हो। यह बदलाव अगस्त 2026 से लागू हो गया है और इसका मकसद कंपनियों के लिए एडमिनिस्ट्रेटिव काम को कम करना और कंप्लायंस का बोझ घटाना है।
इंडस्ट्री की चिंताएं
लेकिन, इस नियम के साथ आई एक नई लिबेलिंग की ज़रूरत ने इंडस्ट्री को परेशान कर दिया है। अब मैन्युफैक्चरर्स को अपने प्रोडक्ट पैकेजिंग पर स्टेरिलाइजेशन फैसिलिटी का खास लाइसेंस नंबर प्रिंट करना होगा। सरकार का कहना है कि इससे ट्रेसिबिलिटी (Traceability) बढ़ेगी, लेकिन इंडस्ट्री का मानना है कि इससे ऑपरेशनल दिक्कतें बढ़ गई हैं।
एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (AiMeD) का कहना है कि यह नियम सप्लाई चेन की फ्लेक्सिबिलिटी को कम करता है। मैन्युफैक्चरर्स अक्सर वॉल्यूम या स्पीड मैनेज करने के लिए अलग-अलग स्टेरिलाइजेशन प्रोवाइडर्स के बीच स्विच करते रहते हैं। लेकिन, पैकेजिंग पर एक खास लाइसेंस नंबर छापने का मतलब है कि वे उस बैच के लिए एक ही प्रोवाइडर से बंध जाएंगे। अगर वह फैसिलिटी व्यस्त है या कोई तकनीकी समस्या आती है, तो मैन्युफैक्चरर पैकेजिंग बदले बिना आसानी से किसी दूसरे प्रोवाइडर पर स्विच नहीं कर पाएगा, जिसमें काफी खर्च और समय लगेगा।
एक्सपोर्ट पर पड़ सकता है असर
यह नई शर्त एक्सपोर्टर्स के लिए और भी मुश्किल खड़ी कर सकती है। इंडस्ट्री के फीडबैक के अनुसार, वैकल्पिक सर्विस प्रोवाइडर्स का इस्तेमाल न कर पाने की वजह से स्टेरिलाइजेशन का टर्नअराउंड टाइम (Turnaround Time) एक हफ्ते से बढ़कर दो-तीन हफ्ते तक हो सकता है। ग्लोबल मार्केट में कंपीटिशन को देखते हुए, शिपिंग और प्रोडक्शन में इस तरह की देरी से ऑर्डर्स पूरे करने और इन्वेंटरी कॉस्ट (Inventory Cost) पर बुरा असर पड़ सकता है।
एक अच्छी खबर भी
हालांकि, इस बीच एक अच्छी खबर यह भी है कि सरकार ने रूल 63 में बदलाव करके यूरोपियन यूनियन (European Union) को एक स्ट्रिक्ट रेगुलेटरी ज्यूरिसडिक्शन (Regulatory Jurisdiction) के तौर पर मान्यता दी है। इसका फायदा यह होगा कि जो मेडिकल डिवाइस पहले से EU में अप्रूव्ड हैं, उनके लिए क्लिनिकल इन्वेस्टिगेशन वेवर (Clinical Investigation Waiver) मिल सकेगा। इससे एडवांस्ड मेडिकल टेक्नोलॉजी (Advanced Medical Technology) भारत में जल्दी आ सकेगी और कुछ इंपोर्टेड प्रोडक्ट्स के लिए डेवलपमेंट टाइमलाइन और लागत कम हो सकती है।
इन्वेस्टर्स के लिए क्या है खास?
इन्वेस्टर्स के लिए यह देखना अहम होगा कि सरकार आने वाले छह महीनों के ट्रांजिशन पीरियड (Transition Period) में इंडस्ट्री की इन चिंताओं को कैसे दूर करती है। अगर इस नियम में कोई स्पष्टीकरण या बदलाव होता है, तो ऑपरेशनल दबाव कम हो सकता है। इन्वेस्टर्स यह भी देख सकते हैं कि क्या बड़ी कंपनियां, जिनके पास इन-हाउस स्टेरिलाइजेशन की सुविधा है या जो इन ज़रूरतों को मैनेज करने के लिए बड़ा स्केल रखती हैं, छोटी मैन्युफैक्चरर्स की तुलना में ज़्यादा फायदा उठा पाएंगी।
