भारत सरकार के 'Prevention of Cruelty to Animals' रूल्स के नए ड्राफ्ट ने इंडस्ट्री में हलचल मचा दी है। ड्रग ट्रायल अप्रूवल के विकेंद्रीकरण (decentralization) को लेकर शुरू हुई इस बहस पर निवेशकों की पैनी नजर है।
नियम में क्या बदल रहा है?
मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने नियमों का नया ड्राफ्ट जारी किया है, जिस पर 5 नवंबर 2026 तक पब्लिक सुझाव मांगे गए हैं। 1998 के पुराने गाइडलाइन्स को बदलने की तैयारी है। सबसे बड़ा बदलाव Rule 11 में है, जो 'Institutional Animal Ethics Committees' (IAECs) को अब कुत्तों और प्राइमेट्स जैसे जानवरों पर 'माइल्ड' और 'मॉडरेट' प्रयोगों को बिना केंद्रीय समिति (CCSEA) की अनुमति के मंजूरी देने की शक्ति देता है।
क्यों हो रहा है विरोध?
विशेषज्ञों और एनिमल वेलफेयर ग्रुप्स का कहना है कि केंद्रीय निगरानी हटने से फार्मा रिसर्च में हितों का टकराव (conflict of interest) बढ़ सकता है। भारत का यह कदम ऐसे समय पर आया है जब दुनिया भर में दवाओं के परीक्षण का तरीका तेजी से बदल रहा है।
ग्लोबल ट्रेंड और निवेशकों के लिए संकेत
अमेरिका की USFDA और यूरोप की EMA जैसी एजेंसियां अब 'New Approach Methodologies' (NAMs) की ओर बढ़ रही हैं, जिसमें AI और इन-विट्रो मॉडल्स का इस्तेमाल होता है।
- निवेशकों के लिए रिस्क: जो कंपनियां पुरानी टेस्टिंग पद्धतियों पर टिकी हैं, वे भविष्य में ग्लोबल रेगुलेटरी मानकों से पीछे छूट सकती हैं।
- परिचालन चुनौतियां: पारंपरिक टेस्टिंग के बजाय नई तकनीक अपनाने वाली कंपनियों और पारंपरिक कंपनियों के बीच ऑपरेशनल अंतर बढ़ सकता है।
अभी शेयर बाजार पर इसका सीधा असर नहीं दिख रहा है, लेकिन 5 नवंबर की डेडलाइन के बाद जब मंत्रालय अंतिम फैसला लेगा, तब सेक्टर के भविष्य की तस्वीर साफ होगी।
