देशव्यापी हड़ताल की तैयारी
ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) ने 20 मई को देश भर में 12 लाख से अधिक केमिस्टों और डिस्ट्रीब्यूटर्स की हड़ताल का ऐलान किया है। यह कदम ई-फार्मेसी के तेजी से बढ़ते कारोबार और उनकी आक्रामक प्राइसिंग पॉलिसी के खिलाफ उठाया गया है। केमिस्टों का मानना है कि ये प्रैक्टिस स्वतंत्र रिटेलरों के लिए खतरा पैदा कर रही हैं और पारंपरिक ड्रग स्टोर्स व बढ़ते ऑनलाइन प्लेयर्स के बीच एक गहरा संघर्ष खड़ा हो गया है।
बाजार में कौन आगे?
भारत के फार्मास्युटिकल रिटेल मार्केट का लगभग 75% हिस्सा पारंपरिक रिटेल स्टोर्स के पास है, जिसका अनुमान $23.96 बिलियन (2024) है। इस सेक्टर में 8.5 लाख से ज्यादा आउटलेट शामिल हैं। वहीं, ई-फार्मेसी सेगमेंट तेजी से रफ्तार पकड़ रहा है। अनुमान है कि ऑनलाइन फार्मेसी का कारोबार 2034 तक $14.08 बिलियन तक पहुंच जाएगा, जो 2026-2034 के बीच 15.98% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ेगा। Tata 1mg, PharmEasy, Truemeds और Apollo 24/7 जैसे बड़े ऑनलाइन प्लेयर अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं, जिससे पारंपरिक स्टोर्स के साथ तनाव बढ़ रहा है।
ई-फार्मेसी नियमों पर चिंता और सुरक्षा का सवाल
AIOCD की मुख्य शिकायत ई-फार्मेसी द्वारा रेगुलेटरी गैप का फायदा उठाने को लेकर है। उनका कहना है कि 2018 के ड्राफ्ट अमेंडमेंट (G.S.R. 817(E)) और COVID-काल के प्रोविजन्स (G.S.R. 220(E)) होम डिलीवरी को बढ़ावा देते हुए अनियंत्रित संचालन की अनुमति देते हैं। केमिस्ट्स का दावा है कि ये प्लेटफॉर्म अक्सर प्रिस्क्रिप्शन को ठीक से वेरिफाई नहीं करते। उनका मानना है कि इससे एंटीबायोटिक्स और नशे की दवाओं का गलत इस्तेमाल हो सकता है, साथ ही एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) जैसी समस्या बढ़ सकती है। हाल ही में यूएस ड्रग एन्फोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन की ओर से भारत से जुड़ी अवैध ऑनलाइन फार्मेसी के खिलाफ की गई कार्रवाई इस वैश्विक चिंता को दर्शाती है।
आक्रामक डिस्काउंटिंग का असर
ई-फार्मेसी की तरफ से की जा रही भारी डिस्काउंटिंग भी एक बड़ा मुद्दा है। हालांकि जरूरी दवाओं की कीमतें कंट्रोल में हैं, लेकिन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दूसरी दवाओं पर भारी छूट देने का आरोप है। ये डील्स, ग्राहकों को भले ही पसंद हों, लेकिन स्वतंत्र केमिस्ट्स का मानना है कि इससे उनके कारोबार को नुकसान हो रहा है, खासकर छोटे शहरों और कस्बों में।
अनिश्चित रेगुलेशन के जोखिम
स्पष्ट रेगुलेशन के बिना ई-फार्मेसी का संचालन जोखिम भरा हो सकता है। ऑनलाइन बिक्री सुविधा और व्यापक पहुंच तो देती है, लेकिन अगर मजबूत और परिभाषित निगरानी न हो तो गड़बड़ियां हो सकती हैं। AIOCD का G.S.R. 817(E) और G.S.R. 220(E) जैसे नियमों को हटाने की मांग इसी चिंता से उपजी है कि ये मौजूदा दवा बिक्री कानूनों को कमजोर कर सकते हैं। केमिस्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो यह विरोध लंबा खिंच सकता है। Tata और Reliance जैसे बड़े ग्रुप्स द्वारा समर्थित बड़ी और अच्छी फंडिंग वाली ऑनलाइन फार्मेसी का बढ़ता दबदबा छोटे केमिस्टों को हाशिये पर धकेल सकता है, जिससे रिटेल मार्केट में विविधता कम हो जाएगी। यह चिंता इस सिद्धांत पर आधारित है कि दवाओं की बिक्री पर सख्त नियंत्रण की जरूरत है, न कि सिर्फ कंज्यूमर प्रोडक्ट मार्केटिंग की।
आगे क्या?
AIOCD की 20 मई की यह हड़ताल सरकार पर ई-फार्मेसी के लिए स्पष्ट रेगुलेशन और 'लेवल प्लेइंग फील्ड' पॉलिसी बनाने का दबाव बनाएगी। डिजिटल हेल्थ में निवेश करने वाले निवेशक सरकारी फैसलों पर नजर रखेंगे, जो ऑनलाइन फार्मेसी के लिए कड़े नियम बना सकते हैं या नियंत्रण बढ़ा सकते हैं। इस टकराव का नतीजा भारत में दवा वितरण के भविष्य को तय करेगा, जहां डिजिटल सुविधा और किफ़ायतीपन को मरीज सुरक्षा और स्थानीय केमिस्टों के अस्तित्व के साथ संतुलित करना होगा। भारत का बढ़ता हेल्थकेयर सेक्टर डिजिटल एडवांसमेंट को इंटीग्रेट करने के साथ-साथ अपने मौजूदा रिटेल नेटवर्क और पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड्स को बचाने के एक अहम फैसले का सामना कर रहा है।
