पारंपरिक बाजार में दरारें, ई-फार्मेसी का दबदबा जारी
ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रग्गिस्ट्स (AIOCD) द्वारा ई-फार्मेसी के खिलाफ बुलाई गई देशव्यापी हड़ताल ने पारंपरिक दवा क्षेत्र की अंदरूनी कमजोरियों को सामने ला दिया है। कई बड़ी फार्मेसी चेन और राज्य स्तरीय संगठन इस हड़ताल का हिस्सा नहीं बन रहे हैं, जो ई-फार्मेसी के बढ़ते बाजार हिस्सेदारी और मौजूदा रेगुलेटरी कमियों का फायदा उठाने की क्षमता को दर्शाता है।
भारतीय ई-फार्मेसी बाजार में जबरदस्त वृद्धि की उम्मीद है। अनुमान है कि यह 2030 तक लगभग $3.4 बिलियन तक पहुंच सकता है, जिसमें सालाना 18-20% की ग्रोथ देखी जा सकती है। टाटा 1एमजी (Tata 1mg) लगभग 31% बाजार हिस्सेदारी के साथ सबसे आगे है, जबकि अपोलो 24/7 (Apollo 24/7) 28% पर है। वहीं, फार्मेसी (PharmEasy) की मूल कंपनी के वैल्यूएशन में 92% की भारी गिरावट आई है, भले ही कंपनी का रेवेन्यू अच्छा हो। दूसरी ओर, अपोलो हॉस्पिटल्स (Apollo Hospitals) का फार्मेसी कारोबार तेजी से बढ़ रहा है और वित्त वर्ष 27 तक ₹25,000 करोड़ का आंकड़ा पार करने का अनुमान है।
इसके विपरीत, पारंपरिक रसायन विक्रेता, जो बाजार का लगभग 54% हिस्सा बनाते हैं, कम मुनाफे, उच्च लागत और सीमित पहुंच के कारण संघर्ष कर रहे हैं। उनका बिखरा हुआ डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क ई-फार्मेसी के डायरेक्ट सेल्स मॉडल की तुलना में कम एफिशिएंट है।
रेगुलेटरी गैप्स से बढ़ता टकराव
AIOCD का विरोध मुख्य रूप से ई-फार्मेसी द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले रेगुलेटरी गैप्स पर केंद्रित है। संस्था का दावा है कि दवाओं की बिक्री के लिए अपर्याप्त प्रिस्क्रिप्शन (Prescription) वेरिफिकेशन के कारण एंटीबायोटिक्स और नशे की दवाओं का अनियंत्रित बिक्रय हो रहा है। इसमें AI-जनरेटेड (AI-generated) नकली प्रिस्क्रिप्शन का इस्तेमाल एक बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर रहा है, जो एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (Antibiotic Resistance) को बढ़ा सकता है।
ई-फार्मेसी के लिए 2018 में प्रस्तावित ड्राफ्ट नियम अभी तक अंतिम रूप नहीं ले पाए हैं, जिससे एक रेगुलेटरी अनिश्चितता बनी हुई है। सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) इन मुद्दों की जांच कर रहा है, लेकिन स्पष्ट नियमों की अनुपस्थिति अनुचित प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे रही है।
बाजार की मुख्य चिंताएं
इस विवाद में कई प्रमुख जोखिम सामने आए हैं:
- बिखरा हुआ विरोध: पारंपरिक फार्मेसी क्षेत्र में एक आम रणनीति की कमी है, क्योंकि कई राज्य संघ और बड़ी चेन AIOCD की हड़ताल में शामिल नहीं हो रहे हैं।
- एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का खतरा: कमजोर जांच के कारण एंटीबायोटिक्स की अनियंत्रित बिक्री से भारत में पहले से मौजूद एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की समस्या और बढ़ सकती है, जिससे गंभीर स्वास्थ्य परिणाम और मृत्यु दर बढ़ सकती है।
- रेगुलेटरी गैप का फायदा: अंतिम रूप न दिए गए नियमों के कारण ऑनलाइन प्लेटफॉर्म एक रेगुलेटरी ग्रे एरिया में काम कर रहे हैं।
- अक्षम सप्लाई चेन: पारंपरिक मल्टी-टियर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम ई-फार्मेसी के डायरेक्ट मॉडल की तुलना में धीमा और महंगा है।
- नकली दवाओं का जोखिम: रेगुलेटरी गैप्स और AI की क्षमता नकली दस्तावेज बनाने में है, जिससे सप्लाई चेन में नकली और निम्न-गुणवत्ता वाली दवाओं के आने का खतरा बढ़ जाता है।
सरकार की मंशा लोगों को, खासकर कमजोर मरीजों को, दवाओं की सुलभता सुनिश्चित करने पर है। हालांकि, सेक्टर के नियमों की समीक्षा से भविष्य में बदलावों के संकेत मिलते हैं। पारंपरिक विक्रेताओं और तेज गति से बढ़ रही ई-फार्मेसी के बीच हितों का टकराव, दवा सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंताएं, भारत के दवा वितरण क्षेत्र को एक महत्वपूर्ण मोड़ पर ला खड़ा करती हैं, जहाँ आगे और अधिक बदलाव और कंसोलिडेशन (Consolidation) की उम्मीद है।